वसीयत - भारत भूषण अग्रवाल
वसीयत भला राख की ढेरी बनकर क्या होगा ? इससे तो अच्छा है कि जाने के पहले अपना सब कुछ दान कर जाऊँ । अपनी आँखें मैं अपनी स्पेशल के ड्राइवर को दे जाऊँगा । ताकि वह गाड़ी चलाते समय भी फ़ुटपाथ पर चलती फुलवारियाँ देख सके अपने कान अपने अफ़सर को …