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माना कि ज़िंदगी से हमें कुछ मिला भी है - इक़बाल अज़ीम

माना कि ज़िंदगी से हमें कुछ मिला भी है माना कि ज़िंदगी से हमें कुछ मिला भी है इस ज़िंदगी को हम ने बहुत कुछ दिया भी है महसूस हो रहा है कि तन्हा नहीं हूँ मैं शायद कहीं क़रीब कोई दूसरा भी है क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं उस को ख़बर नहीं…

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे - इक़बाल अज़ीम

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे ख़्वाब हो जाओगे अफ़्सानों में ढल जाओगे अब तो चेहरों के ख़द-ओ-ख़ाल भी पहले से नहीं किस को मालूम था तुम इतने बदल जाओगे अपने परचम का कहीं रंग भुला मत देना सुर्ख़ शो'लों से जो…

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