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कल के आने वाले बादल - नारायण लाल परमार

कल के आने वाले बादल नहीं दिखते दूर दूर तक पानी लाने वाले बादल पत्तो की चल रही हवा से क्षण प्रतिक्षण है कानाफूसी मांग रही हँसने गाने का खुशबू अपना हक़ मौरूसी आज कभी तक पहुँच न पाए कल के आने वाले बादल यद्यपि पेड़ बहुत जंगल में कोई नहीं बजात…

दुहराते क्यों नहीं - नारायण लाल परमार

दुहराते क्यों नहीं बदले है गाँव के आज हवा पानी सब हर काँधे लटकती अभावों की मोटरी किसी तरह बची हुई प्राणों की कोठरी बादल है चले गए हाय, राजधानी सब लगता, कर दी गई गाँव बदर कोयलिया मुदित नहीं हो पाती सावन तक में घिया गुनाहगार लग रहे…

शहर मर गया - नारायण लाल परमार

शहर मर गया चलो मनाएं शोक साथियों आज हमारा शहर मर गया मौसम उखड रहा है देखो रुठी सी लगती पुरवाई आँखों में काजल उदास है हिचकी लेती है शहनाई सपनो की चंचल साँसों में जैसे कोई जहर भर गया खाली नहीं दिखता कोई लाश ढो रहे सारे कंधे दरपन की दूक…

बहस जारी है - नारायण लाल परमार

बहस जारी है आदमी सलीब पर और बहस जारी हैं जासूसी से भरा लगता हर दृश्य है नोटिस हड़ताल की दे चूका भविष्य है | वर्तमान बेखबर और बहस जारी है | ढोलक से, पीढियां खालीपन सीख रही हर छोटी बड़ी सड़क खुले आम चीख रही | हर शहर हरामखोर और बहस जारी है …

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