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अपनी शताब्दी के नाम - दूधनाथ सिंह

अपनी शताब्दी के नाम दिन पर दिन बादलों की गुहार में दुबलाता रोहिणी की तपन का सिंगार, पथरीले लाल गुलाबों के बिस्तर पर - सिरहाने गोरी शबनम का दुःस्वप्न... दिन पर दिन। मुझे भोर की उँगलियों में बारिश की बूँद-रस्सियों से लपेटती अपनी दुविधाओं से …

जन्म - दूधनाथ सिंह

जन्म - दूधनाथ सिंह मुझमें एक युग है जो परेशान है। मुझमें एक खंडित भूगोल है अखंड जो रेगिस्तान है। मुझमें सदियाँ हैं बेपर्द तन पर पैबंद सिए हुए, बिल्कुल वीरान। मुझमें तुम सब हो एकाकी, भ्रमित-मन, बेहद थके हुए। यहीं कहीं रोज़ सुलगता है-मुझी…

कहीं, कुछ खो गया है - दूधनाथ सिंह

कहीं, कुछ खो गया है कहीं कुछ खो गया है ऐसा जो कभी नहीं था, कहीं नहीं था हर चीज़ एक खोखले अट्टहास में गूँजती हुई... अनिद्रित, आशंकाग्रस्त...। सन्न सन्न हवा चलती है। सब-कुछ जहाँ का तहाँ, जैसा का तैसा— रूप, रंग, अवस्थाएँ...। पृथ्वी पूर्ववत् व्यव…

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