इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं - बाक़र मेहंदी
इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं ख़ुद तोड़ दिया बढ़ के तमन्नाओं का धागा ता-के न बनूँ फिर कहीं इक बंद-ए-मजबूर हाँ कैद़-ए-मोहब्बत से यही सोच के भागा ठोकर जो लगी अपने अज़ाएम ने सँभाला मैं ने तो…