कश्ती - समर प्रदीप
कश्ती ये बात समझने में बहुत देर हो गई तुझे किसी और के साथ चलना था सियाह रात में कई ख़्वाब बुन लिए ख़्वाब जिन्हें कहाँ मुकम्मल होना था खाली कमरे में अब तेरी सदा ढूंढता हूँ ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जां की दवा ढूंढता हूँ बर्फ़ की मानिंद वक़्त भी पिघल रहा है औ…