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बचत - अब्दुल अहद साज़

बचत इन्ही दो से आबाद हर इक का घर है कमाना है फ़न और बचाना हुनर है ये बात आज ही सोचना है ज़रूरी किसे है ख़बर आने वाले दिनों की बुरे वक़्त में काम आएँगे अक्सर रखोगे अगर चार पैसे बचा कर बचत ही से मिल-जुल के बनती है दौलत बचत ही से बढ़ती है मुल्…

खुद को क्यूँ जिस्म का ज़िंदानी करें - अब्दुल अहद साज़

खुद को क्यूँ जिस्म का ज़िंदानी करें खुद को क्यूँ जिस्म का ज़िंदानी करें फिक्र को तख़्त-ए-सुलेमानी करें देर तक बैठ के सोचें खुद को आज फिर घर में बियाबानी करें अपने कमरे में सजाएं आफाक़ जलसा-ए-बे-सर-ओ-सामानी करें उमर भर शेर कहें खून थूकें …

हर एक धडकन अजब आहट - अब्दुल अहद साज़

हर एक धडकन अजब आहट हर एक धडकन अजब आहट परिंदों जैसी घबराहट मिरे लहजे में शीरीनी मिरी आँखों में कड़वाहट मिरी पहचान है शायद मिरे हिस्से कि उकताहट सिमटता शेर है हैयत में बदन की सी यह गदराहट मुसिर मै, फन मिरा जिद पर यह बालकहट यह तिरयाहट …

जागती रात अकेली सी लगे - अब्दुल अहद साज़

जागती रात अकेली सी लगे जागती रात अकेली सी लगे जिंदगी एक पहेली सी लगे रूप का रंग महल, ये दुनिया एक दिन सुनी हवेली सी लगे हम-कलामी तिरी खुश आये उसे शायरी तेरी सहेली सी लगे मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल मुझ को हर रात नवेली-सी लगे रातरानी-…

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