चमकीले तारे - अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
चमकीले तारे क्या चमकीले तारे है, बड़े अनूठे, प्यारे है! आँखों में बस जाते है, जी को बहुत लुभाते है! जगमग-जगमग करते है, हँस-हँस मन को हरते है। नए जड़ाऊ गहने है, जिन्हें रात ने पहने है! कितने रंग बदलते है, बड़े दिए-से बलते है! घर के क…