हुई ताखीर तो कुछ बाइसे ताखीर भी था

हुई ताखीर तो कुछ बाइसे ताखीर भी था
आप आते थे मगर कोई इनाँगीर भी था

तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?

कैद में है तेरे वहशी की वही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँबारि-ए-जंजीर भी था

बिजली कोंद गई आँखों के आगे तो क्या
बात करते के मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था

युसूफ उसको कहूँ और कुछ न कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लायक़े ताज़ीर भी था

देखकर गैर, क्यों हो ना कलेजा ठंडा
नाला करता था, वले तालिबे तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिए ना 'फरहाद' को नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वो जवाँ 'मीर' भी था

हम थे मरने को खड़े, पास न आया न सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?

रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहतें हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था

मायने
ताखीर=ढील/देर, बाइसे=कारण, इनाँगीर=रोकने वाला, बेजा=बिना कारण, शाइब=मिलावट/शक,  खूबी-ए-तकदीर=सौभाग्य, फ़ितराक=शिकारी का थैला, नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर, वहशी=पागल, बारि-ए-जंजीर=जंजीर के बोझ का कष्ट, कोंद=चमक देना, तश्न-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज, युसूफ=एक अवतार का नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है),  ताज़ीर=सजा के योग्य, नाला=रोना, तासीर=प्रभाव, सरों=दीवानों/पागलों, मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम, सोख़=चंचल

नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने

नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात जहा बात बनाये न बने

मै बुलाता तो हू उसको मगर ए जज्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी की बिन आये न बने

खेल समझा है, कही छोड़ न दे, भूल न जाये
काश यु भी हो कि बिन मेरे सताए न बने

गैर फिरता है लिए यु तेरे खत को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने

इस नजाकत का बुरा हो वो भले है तो क्या
हाथ आये तो उन्हें हाथ लगाये न बने

कह सके कौन कि ये जलवागरी किसकी है
पर्दा छोड़ा है वो उसने कि उठाये न बने

मौत कि राह न देखू कि बिन आये न रहे
तुमको चाहू कि न आओ तो बुलाए न बने

बोझ वो सर से गिरा है कि उठाये न बने
काम वो आन पड़ा है कि बनाये न बने

इश्क पर जौर नहीं ये वो आतश ग़ालिब
कि लगाये ना लगे और बुझाये न बने

मायने
नुकताची=मीन-मेख निकालने वाला, जलवागरी=पदर्शन, आतश=आग

अपने आप को मरते हुए देख

दिन इक के बाद एक गुजरते हुए देख
इक दिन तो अपने आप को मरते हुए देख

हर वक्त खिलते फुल की जानिब तका न कर
मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख

पैवंद बादलों के लगे देख जा ब-जा
बगलों को आसमान कुतरते हुए भी देख

उसको खबर ही नहीं है अभी अपने हुस्न की
आईना देके बनते सँवरते हुए भी देख

तारीफ सुनके दोस्त से 'अल्वी' तू खुश न हो
उसको तेरी बुराईयां करते हुए भी देख- मुहम्मद अलवी
[slider title="In Roman"]
din ik ke baad ek gujrate hue dekh
ek din to apne aap ko marte hue dekh

har wakt khilte phool ki janib takaa n kar
murjha ke pattiyo ko bikhrate hue bhi dekh

paiband baadlo ke lage dekh jaa-b-jaa
baglo ko aasmaan kutrate hue bhi dekh

usko khabar hi nahi hai abhi apne husn ki
aaina deke bante sawarte hue bhi dekh

taarif sunke dost se alvi tu khush n ho
usko teri buraiya karte hue bhi dekh - Muhmmad Alvi[/slider]

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे

आईना क्यों न दू की तमाशा कहे जिसे
ऐसा कहा से लाऊ की तुझ सा कहे जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बज्मे-ख्याल में
गुलदस्ता-ए-निगाह, सुवैदा कहे जिसे

फूंका है किसने गोशे-मुहब्बत में ए खुदा
अफ्सुने-इंतजार तमन्ना कहे जिसे

सर पर हुजूमे-दर्दे-गरीबी से डालिए
वो एक मुश्ते-ख़ाक कि सहरा कहे जिसे

है चश्मेतर में हसरते-दीदार से निहां
शौके-इनां गुसेख्ता दरिया कहे जिसे

दरकार है शिगुफ्तने-गुल हाए ऐश को
सुब्हे बहार, पंबा-ए-मीना कहे जिसे

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है की सब अच्छा कहे जिसे

मायने
बज्मे-ख्याल=कल्पना गोष्ठी, गुलदस्ता-ए-निगाह=पुष्प गुच्छ की नज़र, सुवैदा =ह्रदय पर धब्बा, गोशे-मुहब्बत=प्रेम के कान, अफ्सुने-इंतजार=प्रतीक्षा का जादू, हुजूमे-दर्दे-गरीबी=गरीबी कि पीड़ा, मुश्ते-ख़ाक=मुट्ठी भर मिट्टी, चश्मेतर=भीगी आँख, हसरते-दीदार=दर्शनाभिलाषी, निहां=गुप्त, शौके-इनां=रुचिकर लगाम, गुसेख्ता=विक्षिप्त, दरकार=आवश्यकता, शिगुफ्तने-गुल=पुष्प हर्ष, पंबा-ए-मीना=कपास कि सुराही