राक्षस था न खुदा था पहले
आदमी कितना बड़ा था पहले

आसमां, खेत, समंदर, सब लाल
खून कागज पे उगा था पहले

मै वो मक्तूल जो क़ातिल न बना
हाथ मेरा भी उठा था पहले

अब किसी से भी शिकायत न रही
जाने किस-किस से गिला था पहले

शहर तो बाद में वीरान हुआ
मेरा घर ख़ाक हुआ था पहले - निदा फाज़ली

मायने
मक्तूल = मृतक, गिला=शिकायत

Roman
rakshas tha n khuda tha pahle
aadmi kitna bada tha pahle

aasmaan, khet samndar sab laal
khun kaagaz pe uga tha pahle

mai wo maqtul jo qatil n bana
haath mera bhi utha tha pahle

ab kisi se bhi shikayat n rahi
jane kis-kis se gila tha pahle

shahar to baad me veeran hua
mera ghar khaak hua tha pahle - Nida Fazli

#jakhira
खुद को क्यूँ जिस्म का ज़िन्दानी करें
फिक्र को तख़्त-ए-सुलेमानी करें

देर तक बैठ के सोचें खुद को
आज फिर घर में बियाबानी करें

अपने कमरे में सजाएं आफाक़
जलसा-ए-बे-सर-ओ-सामानी करें

उमर भर शेर कहें खून थूकें
मुन्तखिब रास्ता-ए-नुक्सानी करें

खुद के लिए मोल लें इजहार का कर्ज़
दूसरों के लिए आसानी करें

शेर के लब पे खामोशी लिखें
हर्फ़-ए-ना-गुफ्ता को ला-सानी करें

कीमियाकारी है फ़न अपना साज़
आग को बैठे हुए पानी करें - अब्दुल अहद साज़

मायने
ज़िन्दानी = कैदी, तख़्त-ए-सुलेमानी= सोलोमन का सिंहासन, मुन्तखिब = चुनना

Roman

khud ko kyo jism ka zindani kare
fikr ko takht-e-sulemani kare

der tak baith ke soche khud ko
aaj fir ghar me biyabani kare

apne kamre me sajaye aafaq
jalsa-e-be-sar-o-samani kare

umar bhar sher kahe khun thuke
muntkhib rasta-e-nuksani kare

khud ke liye mol le ijhar ka karj
dusro ke liye aasani kare

sher ke lab pe khamoshi likhe
harf-e-na-gufta ko la-sani kare

kimiyakari hai fan apna saaz
aag ko baithe hue paani kare- Abdul Ahad Saaz
#jakhira
चलते-चलते रुका करे कोई
इक तमाशा खड़ा करे कोई

सुस्त रफ़्तार हम नहीं लेकिन
भीड़ इतनी है क्या करे कोई

लुत्फ़ आये जो चांदनी में कभी
बनके खुशबू मिला करे कोई

जिस्म पोशाक से झलकता हो
यूं न खुद को ढका करे कोई

हम तो मुरझाये शाम की सूरत
सुबह बनकर खिला करे कोई

सो गया है ये रास्ता थककर
अब न आवाजे-पा करे कोई

इतनी मुश्किल नहीं जुबां अपनी
कुछ तो समझे खुदा करे कोई - परवेज़ वारिस

मायने
आवाजे-पा=पैर की आहट, जुबां=भाषा

Roman

chalte chalte ruka kare koi
ik tamasha khada kare koi

sust raftaar ham nahi lekin
bhid itni hai kya kare koi

lutf aaye jo chandni me kabhi
banke khushbu mila kare koi

jism poshak se jhalkata ho
yun n khud ko dhaka kare koi

so gaya hai ye rasta thak kar
ab n aawaje-pa kare koi

itni mushkil nahi zubaan apni
kuch to samjhe khuda kare koi- Parvez Waris
#jakhira
राह देखेंगे न दुनिया से गुजरने वाले
हम तो जाते है ठहर जाए ठहरने वाले

एक तो हुस्न बला उस पे बनावट आफत
घर बिगडेंगे हजारों के सवरने वाले

तेरे गेसू-ए-परेशां न करे, सौदाई
सर न हो जाए किसी के ये बिखरने वाले

हश्र में लुत्फ़ हो जब उनसे हो दो बाते
वो कहे कौन हो तुम, हम कहे मरने वाले

हज़रते-दाग जहा बैठ गए बैठ गए
और होंगे तेरी महफ़िल से उभरने वाले - दाग देहलवी

मायने
गेसू-ए-परेशां = बिखरे बाल, सौदाई=दीवाना, हश्र=परलोक

Roman

raah dekhenge n duniya se gujrane wale
ham to jate hai thahar jaye thahrne wale

ek to husn bala us pe banawat aafat
ghar bigdenge hajaro ke sawarne wale

tere gesu-e-paresha n kare, soudai
sar n ho jaye kisi ke ye bikhrane wale

hashr me lutf ho jab unse ho do baate
wo kahe koun ho tum, ham kahe marne wale

Hajrate-Daag jaha baith gaye baith gaye
aur honge teri mahfil se ubharne wale - Daag Dehlavi
#jakhira
साहिर लुधियानवी 1940 से आज तक ज़हनों को चौंकाये रखने वाले शायर का नाम है। उनकी शायरी लोक चेतना में रस घोलती है और दुनिया और जीवन के रहस्य का बोध कराती है। साहिर अपने दौर ही का नहीं, हर दौर का शायर है। साहिर ने जो लिखा वो परदे की ज़रुरत के तहत लिखा, लेकिन जो सोचा वो पीढ़ियों और ज़मानों तक काम में आने वाली बातें हैं। उनका हर एक गीत, ज़िन्दगी को अर्थपूर्ण तरीक़े से जीने का सन्देश देता है।



न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो

ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो

साहिर ने फ़िल्मों के माध्यम से जो भजन लिखे हैं वो भक्ति से मुक्ति तक की राह को दर्शाने वाला एक अदभुत और सच्चा प्रयास है।  

अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान

इतने महान और बहुआयामी व्यक्तित्व पर आज तक जितना लिखा जा चुका है वो उनकी साहित्यिक महानता के आगे न्यूनतर है। जो संदेश और फ़लसफ़ा, साहिर अपनी शायरी के माध्यम से छोड़ गए हैं वो नई पीढ़ी के लिए सीख भी है और ज़रुरत भी। उनका ये संदेश, नई पीढ़ी के लिए इक उदहारण का महत्त्व रखता है और उनका तत्व ज्ञान मानव जीवन को सच्चे रूप में जीने के लिए नए आयाम देता है ।

तोरा मन दर्पण कहलाये
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये

आज ऐसा ही एक मौक़ा है, जब साहिर के इसी बुनियादी संदेश और जीवन के फ़लसफ़े से नई नस्ल को अवगत करवाने की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता के अनुरूप समय-समय पर साहिर के जीवन और व्यक्तित्व पर बहुत सी किताबें और लेख छपते रहे हैं, जिनसे नई पीढ़ी को जीवन को समझने और मनोभाव के शुद्धिकरण के लिए मार्गदर्शन मिलता है। फ़िल्मों के माध्यम से ऐसा कारनामा बहुत कम गीतकारों ने किया है, जिनमें साहिर सर्वोच्च हैं। इन्होने गीतों के माध्यम से मानवीय चेतना के विकास का ऐसा अनुसन्धान किया है, जिसके संयुक्त परिणाम आज भी लाभदायक हैं।

तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा

साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च, 1921 को लुधियाना में एक जागीरदार घराने में हुआ। इनका बचपन माँ-बाप के मन-मुटाव के बीच गुज़रा और आरंभिक शिक्षा, माँ-बाप के इन्हीं झगड़ों और अदालती कार्यवाहियों की भेंट चढ़ गई। ऐसी ही एक अदालती कार्यवाही के दौरान जब जज ने 11 साल के बच्चे (साहिर) से पुछा के तुम किस के साथ रहना चाहते हो, तो साहिर ने ख़ुद को एक तरफ शान-ओ-शौक़त और माल-ओ-दौलत से लदे बाप के करीब पाया, वहीँ दूसरी तरफ़ वक़्त और हालात से जूंझति, ज़िन्दगी की पेचीदगियों में फंसी माँ के आँचल में। ख़ैर साहिर ने माँ के साथ रहने का फैसला किया और एक लम्बे वक़्त तक ग़रीबी में रह कर ज़िन्दगी की कश्ती को दलदल से निकालने की कोशिश करता रहा।

साहिर का बचपन जहाँ ग़रीबी और मानसिक उलझनों में फंसा रहा वहां जवानी रोज़गार की तलाश में फ़िल्म इंडस्ट्री की चौखटों पर सर पटकने, दर-दर भटकने की नज़र होती नज़र आ रही थी। ऐसे में प्रेम धवन के कहने पर फिल्म "दोराहा" के लिए संगीतकार अनिल बिस्वास ने साहिर को एक ग़ज़ल लिखने का मौक़ा दिया, जो साहिर की आने वाली ज़िन्दग़ी में मील का पत्थर साबित हुई ।


मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैं

ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

ऐसे ही महान संगीतकार सचिन देब बर्मन ने जब साहिर का हाथ थामा तो साहिर की तदबीर ने अपनी तक़दीर लिखना शुरू की और वो ज़िन्दगी के नए दाव खेलने के लिए तैयार हो गए -

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाव लगा ले

थोड़ी ही मुद्दत के बाद बी आर चोपड़ा और यश चोपड़ा की सोहबत ने साहिर की संवरती किस्मत को और चमका दिया। ये चमक थी बी आर बैनर तले बनने वाली हर उस नायाब और अर्थपूर्ण फ़िल्म की जिसने साहिर की कलम को न सिर्फ़ लिखने की आज़ादी दी, बल्कि जानदार फ़िल्मी दृश्यों की बदौलत एक सुनेहरा मौक़ा भी दिया। अब साहिर के ज्ञान की रोशनी दीपावली के दीयों की तरह लोगों के ज़हनों को रोशन करने लगी।

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
यह तिरागी जो मेरे ज़ीस्त का मुकद्दर है
तेरी नज़र की शुआँओं में खो भी सकती थी

साहिर के गीतों ने 4 दशकों तक धूम मचाये रखी, किसी फ़िल्म में साहिर के गीतों का होना, फ़िल्म की कामयाबी का सूत्र समझा जाने लगा। साहिर ने अपने ज़माने के दिग्गजों के साथ काम किया और नाम भी कमाया, इनमें एस डी बर्मन, गुरु दत्त, देव आनंद, बी आर चोपड़ा वग़ैरह शामिल हैं। साहिर ने न सिर्फ़ अपनी शायरी बल्कि व्यावहारिकता से भी इंसानी क़द्रों को ज़िन्दगी भर नीचे गिरने नहीं दिया, चाहे हालात कितने ही सख़्त क्यों न रहे हों।

साहिर की ज़िन्दगी सख़्त, मेहनत भरी, जिद्दो-जहद और कश्मकश की रही। वक़्त ने साहिर को अपनी निजी ज़िन्दगी बनाने और संवारने का कोई मौक़ा नहीं दिया। वो शायर जिस ने लोगों की वीरान ज़िंदगियों को नई मुस्कान दी, उसका अपना जीवन इन मुस्कुराहटों से दूर ही रहा । फ़िल्मी परदे पर इन्होने एक से एक कामयाब रूमानी गीत लिखा, हालांकि इनके वास्तविक जीवन में कोई रूमानियत अपने अंजाम को नहीं पहुँच सकी, फिर वो लता मंगेश्कर से मोहब्बत हो, अमृता प्रीतम से इश्क़ हो, सुधा मल्होत्रा से लगाव हो या ख़दीजा मसरूर (मशहूर कहानीकार) से उनकी सगाई हो।

छू लेने दो नाज़ुक होठों को
कुछ और नहीं है जाम हैं ये
क़ुदरत ने जो हमको बख़्शा है
वो सबसे हंसीं ईनाम है ये

साहिर की पूरी शायरी और ज़िन्दगी पांच मज़बूत स्तंभों 
(1) औरत की हिमायत, 
(2) राष्ट्रीय एकता और अखंडता, 
(3) सामाजिक समानता, 
(4) देशभक्ति और 
(5) रूमानियत पर टिकी हुई है।

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला, कुचला , जब जी चाहा दुत्कार दिया
काबे में रहो या काशी में , निस्बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो के रहीम कहो, मतलब तो उसी की बात से है
ये मस्जिद है वो बुतखाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना , एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना , ये देश है दुनिया का गहना
जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा, रोके ज़माना चाहे रोके खुदाई तुमको आना पड़ेगा

साहिर आखिरी दिनों तक अपनी माँ के साथ अकेला रहा और फिर एक दिन माँ की मौत के 4 साल बाद 25 अक्टूबर 1980 को इंसानियत का ये पयामबर, इस दुनिया से कूच कर गया।

जिस्म की मौत, कोई मौत नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से, इंसान नहीं मर जाते

साहिर के जीवन और उनकी फ़िक्र ने जो जोत जलाई थी उसे रोशन रखने के लिए साहिर लुधियानवी जीनियस ग्लोबल रिसर्च कौंसिल का गठन किया गया है। जिसने साहिर की फ़िक्र, सन्देश और फ़लसफ़े पर गहरा शोध करने और नई पीढ़ी में इन बातों को आम करने के लिए एक किताब "मैं साहिर हूँ" लिखवाई है, जिसे चन्दर वर्मा और डॉ सलमान आबिद ने 7 साल के शोध के बाद हिंदी और उर्दू भाषाओँ में लिखा है। इन किताबों को साहिर के अर्ध शतक मित्र श्री अमरनाथ वर्मा (चेयरमैन, स्टार पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली) ने बड़े चाव से प्रकाशित किया है । 

डॉ सलमान आबिद और चन्दर वर्मा
साहिर लुधियानवी जीनियस ग्लोबल रिसर्च कौंसिल
https://www.facebook.com/SahirLudhianviGeniusGlobalCouncil
#jakhira
बस दो चार अफवाहें उड़ा दो
यहाँ जब चाहे दंगा करा दो

रोटी-वोटी लोग भूल जायेंगे
बस मंदिर-मस्जिद मुद्दा उठा दो

भडकाना हो अगर बेवकूफों को
सिर्फ एक फर्जी विडियो चला दो

नासमझ, नादान भेडो का झुण्ड है
जिधर मर्जी आये, उधर हंका दो

सियासत का खास दाव है यही
चुनाव आये तो सब को लड़ा दो

मजहब के नाम पर वोट मांगे जो
उस नेता को दहलीज से भगा दो

अरमाँ का हिंदोस्ता बचाना है तो
हिंदू, मुस्लिम का फर्क मिटा दो - अरमान खान 

Roman

bas do char afwahe uda do
yaha jab chahe danga kara do

roti-woti log bhul jaynege
bas mandir-masjid mudda utha do

bhadkana ho agar bewkufo ko
sirf ek farji video chala do

nasamjh, nadan bhedo ka jhund hai
jidhar marji aaye udhar haka do

siyasat ka khas daav hai yahi
chunav aaye to sab ko lada do

majhab ke naam par vote mange jo
us neta ko dahleej se bhaga do

armaan ka hindostaan bachana hai to
hindu muslim ka fark mita do- Armaan Khan
Armaan Khan on FB
#jakhira