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अन्याय,शोषण, भेदभाव को सहना सीख लिया है
पत्थरों की तरह जीना लोगों ने सीख लिया हैं

अंधे,बहरे,गूंगे की तरह ज़ीना सीख लिया है
ज़मीर अपना गिरवी रखना लोगो ने सीख लिया है

रोशनी की एक किरण भी नही रही दिल में
इंसानियत को छोड़ना लोगों ने सीख लिया है

अन्याय,शोषण,भेदभाव की नाइंसाफी को सहते सहते
अपनी इंसानियत को बेचना लोगों ने सीख लिया है

इंसान ने अपने अपने अंदर की कमियों को छोड़कर
दूसरों की कमियो को गिनना लोगों ने सीख लिया है- मुनिकेश सोनी

Roman

anyay, shoshan, bhedbhav ko sahna sikh liya hai
pattharo ki tarah jeena logo ne sikh liya hai

andhe, bahre, gunge ki tarah jeena sikh liya hai
jameer apna girvi rakhana logo ne sikh liya hai

roshni ki ek kiran bhi nahi rahi dil me
insaniyat ko chhodna logo ne sikh liya hai

anyaay, shoshan, bhedbhav ki nainsafi ko sahte sahte
apni insaniyat ko bechna logo ne sikh liya hai

insaaan ne apne andar ki kamiyo ko chhodkar
dusro ki kamiyo ko ginna logo ne sikha liya hai - Munikesh Soni
#jakhira
अपने ख़्वाबों में तुझे जिसने भी देखा होगा
आँख खुलते ही तुझे ढूँढने निकला होगा

ज़िन्दगी सिर्फ़ तेरे नाम से मन्सूब रहे
जाने कितने ही दिमाग़ों ने ये सोचा होगा

दोस्त हम उसको ही पैग़ाम-ए-करम समझेंगे
तेरी फ़ुर्क़त का जो जलता हुआ लम्हा होगा

दामन-ए-ज़ीस्त में अब कुछ भी नहीं है बाक़ी
मौत आयी तो यक़ीनन उसे धोखा होगा

रौशनी जिससे उतर आई लहू में मेरे
ऐ मसीहा वो मेरा ज़ख़्म-ए-तमन्ना होगा-अब्बास अली दाना

Roman

apne khwabo me tujhe jisne bhi dekha hoga
aankh khulte hi tujhe dhundhne laga hoga

zindgi sirf tere naam se mandub rahe
jaane kitne hi dimago ne ye socha hoga

dost ham usko hi paigam-e-karam samjhege
teri furkat ka jo jalta hua lamha hoga

daman-e-jist me ab kuch bhi nahi hai baki
mout aayi to yakinan use dhokha hoga

roushni jisse utar aai lahu me mere
e masiha wo mera jakhm-e-tamnna hoga - Abbas Ali Dana
#jakhira
वो कुछ गहरी सोच में ऐसे डूब गया है
बैठे बैठे नदी किनारे डूब गया है

आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी
आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है

वो जो प्यासा लगता था सैलाब-जदा था
पानी पानी कहते कहते डूब गया है

मेरे अंदर एक भंवर था जिस में
मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है

शोर तो यूं उठ्ठा था जैसे इक तूफ़ान हो
सन्नाटे में जाने कैसे डूब गया है

आखिरी ख्वाहिश पूरी कर के जीना कैसा
आनिस भी साहिल तक आ के डूब गया है - आनिस मुईन

Roman

wo kuch gahri soch me aise dub gaya hai
baithe baithe nadi kinare dub gaya hai

aaj ki rat n jane kitni lambi hogi
aaj ka suraj sham se pahle dub gaya hai

wo jo pyasa lagta tha sailab-zada tha
pani pani kahte kahte dub gaya hai

shor to yun uththa tha jaise ik tufan ho
sannate me jane kaise dub gaya hai

aakhiri khwahish puri kar ke jeena kaisa
Anis bhi sahil tak aa ke dub gaya hai - Anis Moin/Muin
#jakhira

युवा शेरो कि पहली किश्त में पहले शायर है नैय्यर इमाम सिद्दीकी जिनकी नज्म अलाव आपके लिए पेश है :

जब से तुम गए हो
कुछ लिख ही नहीं पाता
मेरी ज़िन्दगी कोरे काग़ज़ की तरह हो गयी है
क़लम है के ख़ामोश है
और दिमाग़ कि बस
लफ्ज़ ही ढूँढता रहता है
और दिल
दिल का क्या कहूं
इस में तुम बन के हुक समाई हो
लबों पे हैं एक तवील ख़ामोशी
और आँखों में पसरी है वीरानी
और ख्यालों में
न टूटने वाला सन्नाटा
ऐसा लगता है जैसे
मैं इंसान नही
कोई सुनसान खँडहर हूँ
जो फिर से बसना चाहता है हवेली बन कर
तो
बस इतनी सी इल्तिजा है
लौट आओ मेरी दुनिया में वापस
सर्दी में जलते अलाव की तरह
क्यूंकि
दूर रह के जलने से से अच्छा है कि
पास रह के नफरत की आग को सुलगाये रखें
बोलो
वापस आओगी न? - नैय्यर इमाम सिद्दीकी

Roman

Jab se tum gaye ho
kuch likh nahi pata
meri zindgi kore kagaj ki tarah ho gayi hai
kalam hai ke khamosh hai
aur dimag ki bas
lafz hi dhundhta rahta hai
aur dil
dil ka kya kahu
is me tum ban ke huk samai ho
labo pe hai ek taweel khamoshi
aur aankho me pasri hai veerani
aur khayalo me
n tutne wala sannata
aisa lagta hai jaise
ma inasaan nahi
koi sunsan khandhar hu
jo fir se basna chahta hai haweli bankar
to bas itni si iltija hai
lout aao meri duniya me wapas
sardi me jalte alaav ki tarah
kyuki
door rah ke jalne se achcha hai ki
paas rah ke nafrat ki aag ko sulgaye rakhe
bolo wapas aaogi na? - Naiyyar Imam Siddiqi
#jakhira

नैय्यर इमाम जी रायपुर के रहने वाले है आपसे facebok पर संपर्क किया जा सकता है और आपका मेल एड्रेस है naiyarimam88@gmail.com
कैसे-कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं,
अपने-अपने ग़म के फ़साने हमें सुनाने आ जाते हैं।

मेरे लिए ये ग़ैर हैं और मैं इनके लिए बेगाना हूँ
फिर एक रस्म-ए-जहाँ है जिसे निभाने आ जाते हैं।

इनसे अलग मैं रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में
मेरी ये मजबूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं।

सबकी सुनकर चुप रहते हैं, दिल की बात नहीं कहते
आते-आते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं। - मुनीर नियाजी

आइये इसे मेहन्दी हसन साहब की आवाज में सुनते है


Roman

kaise kaise log hamare ji ko jalane aa jate hai
apne-apne gam ke fasane hame sunane aa jate hai

mere liye ye gair hai aur mai inke liye baigana hu
fir ek rasm-e-jahaan hai jise nibhane aa jate hai

inse alag mai rah nahi sakta is bedard jamane me
meri ye majburi mujhko yaad dilane aa jate hai

sabki sunkar chup rahte hai, dil ki bat nahi kahte
aate-aate jine ke bhi laakh bahane aa jate hai - Munir Niazi
#jakhira

पकिस्तान की मशहूर शायर अदा जाफरी का कराची के अस्पताल में आज (13/03/2015) को निधन हो गया है वे 90 बरस की थी आपने अपनी शायरी की शुरुवात 13 वर्ष की उम्र से कर दी थी आपका जन्म बदायु में 22 अगस्त 1924 को हुआ पहले आपने अपना तखल्लुस अदा बदायुनी रखा बाद में नरुल हसन जाफरी के शादी के बाद आपने अपना तखल्लुस अदा जाफरी कर दिया |

न ग़ुबार में न गुलाब में मुझे देखना
मेरे दर्द की आब-ओ-ताब में मुझे देखना

किसी वक़्त शाम मलाल में मुझे सोचना
कभी अपने दिल की किताब में मुझे देखना

किसी धुन में तुम भी जो बस्तियों को त्याग दो
इसी रह-ए-ख़ानाख़राब में मुझे देखना

किसी रात माह-ओ-नजूम से मुझे पूछना
कभी अपनी चश्म पुरआब में मुझे देखना

इसी दिल से हो कर गुज़र गये कई कारवाँ
की हिज्रतों के ज़ाब में मुझे देखना

मैं न मिल सकूँ भी तो क्या हुआ के फ़साना हूँ
नई दास्ताँ नये बाब में मुझे देखना

मेरे ख़ार ख़ार सवाल में मुझे ढूँढना
मेरे गीत में मेरे ख़्वाब में मुझे देखना

मेरे आँसुओं ने बुझाई थी मेरी तश्नगी
इसी बरगज़ीदा सहाब में मुझे देखना

वही इक लम्हा दीद था के रुका रहा
मेरे रोज़-ओ-शब के हिसाब में मुझे देखना

जो तड़प तुझे किसी आईने में न मिल सके
तो फिर आईने के जवाब में मुझे देखना - अदा जाफ़री

Roman

n gubar me n gulab me mujhe dekhna
mere dard ki aab-o-taab me mujhe dekhna

kisi waqt shama malal me mujhe sochna
kabhi apne dil ki kitab me mujhe dekhna

kisi dhoon me tum bhi jo bastiyo ko tyag do
isi rah-e-khanakharab me mujhe dekhna

kisi raat maah-o-najum se mujhe puchhna
kabhi apni chashm puraab me mujhe dekhna

isi dil se ho kar gujar gaye kai karvan
ki hijrato ke zaab me mujhe dekhna

mai n mil saku bhi to kya hua ke fasana hu
nai dasta naye baab me mujhe dekhna

mere khar khar sawal me mujhe dhundhna
mere geet me, mere khwab me mujhe dekhna

mere aasuo ne bujhai thi meri tashnagi
isi bargjida sahab me mujhe dekhna

wahi ik lamha deed tha ke ruka raha
mere roj-o-shab ke hisab me mujhe dekhna

jo tadap tujhe kisi aaine me n mil sake
to fir aaine ke jawab me mujhe dekhna - Ada Jafri
#jakhira

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