एक क़तरा मलाल भी बोया नहीं गया
वोह खौफ था के लोगों से रोया नहीं गया

यह सच है के तेरी भी नींदें उजड़ गयीं
तुझ से बिछड़ के हम से भी सोया नहीं गया

उस रात तू भी पहले सा अपना नहीं लगा
उस रात खुल के मुझसे भी रोया नहीं गया

दामन है ख़ुश्क आँख भी चुप चाप है बहुत
लड़ियों में आंसुओं को पिरोया नहीं गया

अलफ़ाज़ तल्ख़ बात का अंदाज़ सर्द है
पिछला मलाल आज भी गोया नहीं गया

अब भी कहीं कहीं पे है कालख लगी हुई
रंजिश का दाग़ ठीक से धोया नहीं गया - फरहत अब्बास शाह ( فرحت عباس شاہ)

Roman

Ek katra malal bhi boya nahi gaya
woh khouf ke logo se roya nahi gaya

yah sach hai ke teri bhi ninde ujad gayi
tujh se bichchad ke ham se bhi soya nahi gaya

us raat tu bhi pahle sa apna nahi laga
us raat khul ke mujhse bhi roya nahi gaya

daman hai khushk aankh bhi chupchap hai bahut
ladiyo me aansuo ko piroya nahi gaya

alfaz talkh, baat ka andaj sard hai
pichla malal aaj bhi goya nahi gaya

ab bhi kahi kahi pe kalakh lgi hui
ranjish ka daag thik se dhoya nahi gaya - Farhat Abbas Shah
#jakhira
जगती रात अकेली सी लगे
जिंदगी एक पहेली सी लगे

रूप का रंग महल, ये दुनिया
एक दिन सुनी हवेली सी लगे

हमकलामी तिरी खुश आये इसे
शायरी तेरी सहेली सी लगे

रातरानी-सी वो महके खामोश
मुस्कुरा दे तो चमेली सी लगे

फन की महकी हुई मेहँदी से रची
से बयाज़ उसकी हथेली-सी लगे - अब्दुल अहद साज़ 
मायने
हमकलामी=एक दूसरे से बातचीत, बयाज़=शायर की कापी

Roman

jagti raat akeli si lage
zindgi ek paheli si lage

roop ka rang mahal, ye duniya
ek din suni haweli si lage

hamkalami tiri khush aaye ise
shayari teri saheli si lage

ratrani si wo mahke khamosh
muskura de to chameli si lage

fan ki mahki hui mehndi se rachi
se bayaz uski hatheli si lage- Abdul ahad Saaz
#jakhira

चीनी हो जापानी हो
रूसी हो ईरानी हो
बाशिंदा हो लंका का
या वो हिंदुस्तानी हो

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

अनवर हो अरबिंदो हो
मरियम हो या इंदु हो
मुस्लिम हो या ईसाई
वो सिख हो या हिन्दू हो
सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

सेठ भिकारी एक समान
मिल मालिक हो या दरबान
जिस की कुटिया छोटी सी
जिस का बंगला आलीशान

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

फौजी हो या पटवारी
मेरासी या भंडारी
खेती करने वाला हो
या करता हो सरदारी

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

चपरासी हो या अफसर
मौची हो या सौदागर
खींच रहा है जो रिक्शा
जो बेठा है रिक्शा पर

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

पंजाबी हो या सिंधी
उर्दू बोले या हिंदी
धौती पहने या सलवार
फूल सजाऐ या बिंदी

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है

काम ज़रूरी करता हो
या मज़दूरी करता हो
जो भी हो वो जैसा भी
मेंहनत पूरी करता हो

सब का मान बराबर है
हर इंसान बराबर है - मुजफ्फर हनफ़ी

Roman

chini ho ya japani
rusi ho irani ho
bashinda ho lanka ka
ya wo hindustaani ho

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

anwar ho ya arbindo ho
mariyam ho ya indu ho
muslim ho ya isai
wo sikkh ho ya hindu ho

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

seth bikhari ek saman
mil malik ho ya darban
ji ki kutiya chhoti si
jis ka bangla aalishan

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

fouzi ho ya patwari
merasi ya bhandari
kheti karne wala ho
ya karta ho sardari

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

chaprasi ho ya afsar
mouchi ho ya soudagar
khinch raha hai jo riksha
jo baitha hai riksha par

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

panjabi ho ya sindhi
Urdu bole ya Hindi
dhouti pahne ya salwar
phool sajaye ya bindi

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai

kaam jaruri karta ho
ya majduri karta ho
jo bhi ho wo jaisa bhi
mehnat puri karta ho

sab ka maan barabar hai
har inasaan barabar hai - Muzffar Hanfi
#jakhira
क्या लिखू क्या मंज़र है
फूल के हाथ में पत्थर है

ऐसी बारिश ऐसी हवा
सारा गुस्सा मुझ पर है

प्यासा है तो प्यास दिखा
तू कोई पैगम्बर है

दीवाने! दीवाना बन
तेरे हक में बेहतर है

मै कैसे मर सकता हू
इतना कर्जा मुझ पर है

अपनी खैर मनाओ मियां
अगला पत्थर तुम पर है

अच्छी है बारिश लेकिन
छत पर एक कबूतर है - रऊफ रज़ा

Roman

Kya likhu kya manzar hai
phool ke haath me patthar hai

aisi barish aisi hawa
sara gussa mujh par hai

pyasa hai to pyas dikha
tu koi paigambar hai

deewane! deewana ban
tere haq me behatar hai

mai kaise mar sakta hu
itna karja mujh par hai

apni khair manao miyan
agla patthar tum par hai

achchi hai barish laikin
chhat par ek kabutar hai- Rauf Raza
#jakhira
बस एक नूर झलकता हुआ नज़र आया
फिर उसके बाद न जाने चमन पे क्या गुजरी

मै काश तुमको अहले-वतन बता सकता
वतन से दूर किसी बे-वतन पे क्या गुजरी

मेरे चमन में भी आई तो थी बहार मगर
मै क्या समझाऊ कि अहले-चमन पे क्या गुजरी

खामोश क्यों कातिलों-नदीम कुछ तो कहो
हमारे बाद हमारे वतन पे क्या गुजरी - जगन्नाथ आज़ाद

bas ek noor jhalkata hua nazar aaya
fir uske baad n jane chaman pe kya gujri

mai kaash tumko ahle-watan bata sakta
watan se door kisi be-watan pe kya gujri

mere chaman me bhi aai to thi bahaar magar
mai kya samjhau ki ahle-chaman  pe kya gujri

khamosh kyo ho katilo-nadeem kuch to kaho
hamare baad hamare watan pe kya gujri - Jagnnath Azad
#jakhira
मैंने देखा चेहरा चेहरा
सबसे अच्छा तेरा चेहरा

अपनी किस्मत में लिखा है
दूर से तकते रहना चेहरा

अच्छा लगता और ज्यादा
उसका रूठा-रूठा चेहरा

शब् को चाँद दिखाया मैंने
जबसे उतरा उसका चेहरा

अक्सर धोखा दे जाता है
दिल को छू लेने वाला चेहरा

आईने में शाम का मंज़र
कब तक देखू अपना चेहरा - महवर नूरी

Roman

maine dekha chehra-chehra
sabse achcha tera chehra

apni kismat me likha hai
door se takte rahna chehra

achcha lagta aur jyada
uska rutha-rutha chehra

shab ko chaand dikhaya maine
jabse utra uska chehra

aksar dhokha de jata hai
dil ko choone wala chehra

aaine me shaam ka manzar
kab tak dekhu apna chehra- Mahwar Noori