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राज़िक़ अंसारी साहब इंदौर के रहने वाले है आपने अपनी शायरी की शुरुवात सन 1985 में की थी आपका जन्म 1 अप्रैल 1960 को हुआ |

मक़तल छोड़ के घर जाएं नामुमकिन है
वक़्त से पहले मर जाएं नामुमकिन है

हमदर्दी से रोज़ कुरेदे जाते हैं
ज़ख़्म जिगर के भर जाएं नामुमकिन है

ग़ेरों जैसा अपने साथ रखा वरना
हम तुझ से बाहर जाएं नामुमकिन है

मजबूरी ने बांध रखे हैं अपने हाथ
वरना तुझ से डर जाएं नामुमकिन है

दरवाज़े पर बैठी होंगी उम्मीदें
ले कर चश्मे तर जाएं नामुमकिन है - राज़िक़ अंसारी

Roman

maqtal chhod ke ghar jaye namumkin hai
waqt ke pahle mar jaye namumkin hai

hamdardi se roz kurede jate hai
jakhm jigar ke bhar jaye namumkin hai

gairo jaisa apne sath rakha warna
ham tujh se bahar jaye namumkin hai

majburi ne bandh rakhe hai apne hath
warna tujh se dar jaye namumkin hai

darwaje par baithi hogi ummide
le kar chashme tar jaye namumkin hai - Razique Anasri
#jakhira


गुस्सा बेगाना-वार होना था
बस यही तुझसे यार होना था

क्यों न होते अज़ीज़ गैर तुम्हे
मेरी किस्मत में ख़्वार होना था

मुझे जन्नत में वह सनम न मिला
हश्र और एक बार होना था

खाक होता न मै तो क्या करता
उसके दर का गुबार होना था

हरजारगर्दी से हम ज़लील हुए
चर्ख का एतबार होना था

सब्र कर सब्र, हो चूका जो कुछ
ऐ दिले-बेकरार होना था

रात-दिन बादा-ओ-सनम 'मोमिन'
कुछ तो परहेज़गार होना था - मोमिन खां मोमिन
मायने
बेगाना-वार=अनजानो की तरह, अज़ीज़=प्यारा, ख्वार=अपमान, गुबार=गर्द, हरजारगर्दी=घुमक्कड, चर्ख=समान/आसमान, बादा-ओ-सनम=प्रिय और मदिरा

Roman

gussa begana-war hona tha
bas yahi tujhse yaar hona tha

kyo n hote aziz gair tumhe
meri kismat me khwar hona tha

mujhe jannat me wah sanam n mila
hashr aur ek baar hona tha

khak hota n mai to kya karta
uske dar ka gubar hona tha

harzaargardi se ham jalil hue
charkh ka aetbaar hona tha

sabr kar sabr, ho chuka jo kuch
ae dile-bekrar hona tha

raat-din bada-o-sanam 'Momin'
kuch to parhejgaar hona tha - Momin Khaan Momin
#jakhira
Gurpreet Kafir
इंसानियत का कत्ल सरेआम हो रहा है,
अभी चुप रहो तुम, आवाम सो रहा है ।

हो धरम या सियासत बस एक ही कहानी
हाथों में छुरी ले के राम राम हो रहा है ।

हर बात अदाकारी क्या खूब राजनीती
कानून बनाने का, शायद काम हो रहा है ।

घर से तो चाहे निकलो, पर उस तरफ न जाना
भगवान सो रहे हैं, आराम हो रहा है ।

हमने न कभी देखा हमने न कभी जाना
सुनते हैं हर गली में अपना नाम हो रहा है

बारूद की महक चारों तरफ है फैली
"काफ़िर" को उडाने का ताम झाम हो रहा है । -गुरप्रीत काफिऱ

Roman

insaniyat ka katl sareaam ho raha hai
abhi chup raho tum, awam so raha hai

ho dharam ya siyasat bas ek hi kahani
hatho me churi le ke ram ram ho rha hai

har baat adakari kya khoob rajniti
kanoon banane ka, shayad kam ho raha hai

ghar se to chahe niklo, par us taraf n jana
bhagwan so rahe hai, aaram ho rha hai

hamne n kabhi dekha hamne n kabhi jana
sunte hai har gali me apna naam ho rha hai

barud ki mahak charo taraf hai faili
kafir ko udane ka tam jham ho raha hai -Gurpreet Kafir
#jakhira
रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम, तुम से तू होने लगी

मेरी रुसवाई की नौबत आ गयी
शोहरत उनकी कूबकू होने लगी

अब के मिल के देखिये क्या रंग हो
फिर हमारी जुस्तजू होने लगी

दाग़ इतराए हुए फिरते है आज
शायद उनकी आबरू होने लगी - दाग देहलवी
मायने
रुसवाई = बदनामी, कूबकू=गली-गली, जुस्तजू=तलाश

Roman

ranj ki jab guftgu hone lagi
aap se tu, tum se tu hone lagi

meri ruswai ki noubat aa gayi
shohrat unki koobkoo hone lagi

ab ke mil ke dekhiye kya rang ho
phir hamari justjoo hone lagi

daag itraye hue firte hai aaj
shayad unki aabru hone lagi - Daag Dehlavi
#jakhira
आज ही के दिन 24 जुलाई 1991 को ठीक 24 साल पहले शायर कैफ भोपाली साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए और अपनी यादो उनके मुरीदो के लिए छोड़ गए उनकी एक मशहूर ग़ज़ल आप सबके लिए पेश है
उसका अंदाज है अभी तक लड़कपन वाला
मीठा लगता है उसे नीम वो आँगन वाला

अब भी मेरे लिए चिलमन से निकल आता है
सावला फूल सा इक हाथ वो कंगन वाला

बिजलियाँ आँखों की जुल्फों की घटाए लेकर
तुम चले आओ तो मौसम रहे सावन वाला

ताके बिछड़े तो बिछड़ने का कुछ अहसास न हो
हम से रक्खो तौर तरीका कोई दुश्मन वाला- कैफ भोपाली

Roman

uska andaaz hai abhi tak ladakpan wala
metha lagta hai use neem wo aangan wala

ab bhi mere liye chilman se nikal aata hai
sawla phool sa ik haath wo kangan wala

bijliya aankho ki zulfo ki ghataye lekar
tum chale aao to mousam rahe sawan wala

taake bichhde to bichhdane ka kuch ahsaas n ho
ham se rakkho tour tarika koi dushman wala - Kaif Bhopali
#jakhira
गरीबे शहर का सर है के शहरयार का है
ये हमसे पूछ के गम कौन सी कतार का है

किसी की जान का, न मसला शिकार का है
यहाँ मुकाबला पैदल से शहसवार का है

ऐ आबो-ताबे-सितम, मश्क क्यू नहीं करता
हमें तो शौक भी सेहरा-ए-बेहिसार का है

यहाँ का मसला मिटटी की आबरू का नहीं
यहाँ सवाल जमीनों पे इख्तियार का है

वो जिसके दर से कभी जिंदगी नहीं देखी
ये आधा चाँद उसी शहरे-यादगार का है

ये ऐसा ताज है जो सर पे खुद पहुचता है
इसे जमीन पे रख दो ये खाकसार का है - अहमद कमाल 'परवाजी'

मायने
शहरयार=बादशाह, मसला=समस्या, ऐ-आबो-ताबे-सितम=जुल्म करने वाला, मश्क=अभ्यास, सेहरा-ए-बेहिसर=जिसकी कोई हद नहीं, आबरू=मान, इख्तियार/अख्तियार=अधिकार

Roman

garibe shahar ka sar hai ke shaharyaar ka hai
ye hamse puch ke gam koun si kataar ka hai

kisi ki jaan ka, n masla shikar ka hai
yaha mukabala paidal se shahsawar ka hai

ae aabo-tabe-sitam, mashq kyu nahi karta
hame to shouk bhi sehra-e-behisar ka hai

yaha ka masala mitti ki aabru ka nahi
yaha sawal jamino pe ikhtiyar ka hai

wo jiske dar se kabhi jindgi nahi dekhi
ye aadha chand usi shahre yaadgar ka hai

ye aisa taaj hai jo sar pe khud pahuchta hai
ise jamin pe rakh do ye khaksar ka hai - Ahmad Kamaal Parwaji/Parwazi
#jakhira