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एक टूटी हुई ज़ंजीर की फ़रियाद हैं हम - मेराज फैजाबादी
एक टूटी हुई ज़ंजीर की फ़रियाद हैं हम - मेराज फैजाबादी

एक टूटी हुई ज़ंजीर की फ़रियाद हैं हम और दुनिया ये समझती है के आज़ाद हैं हम क्यों हमें लोग समझते हैं यहाँ परदेसी इक मुद्दत से इसी शहर में आ...

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इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं - बाक़र  मेहंदी
इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं - बाक़र मेहंदी

इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं ख़ुद तोड़ दिया बढ़ के तमन्नाओं का धागा ता-के न बनूँ फिर कहीं इक बंद-ए-मजबूर हाँ कैद़-ए-मोहब्ब...

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मेरे ख्वाबों के झरोखों को सजाने वाली - साहिर लुधियानवी
मेरे ख्वाबों के झरोखों को सजाने वाली - साहिर लुधियानवी

मेरे ख्वाबों के झरोखों को सजाने वाली तेरे ख्वाबों में कही मेरा गुजर है कि नहीं पूछकर अपनी निगाहों से, बता दे मुझको मेरी रातो में मुकद्द...

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अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे - अल्लामा इकबाल
अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे - अल्लामा इकबाल

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे खवाब हो जाओगे अफसानों में ढल जाओगे अपनी मिटटी पे ही चलने का सलीका सीखो संग-ए-मरमर पे चलोगे तो फिसल जाओग...

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यही वफ़ा का सिला है तो कोई बात नहीं - शकील बदायूंनी
यही वफ़ा का सिला है तो कोई बात नहीं - शकील बदायूंनी

यही वफ़ा का सिला है तो कोई बात नहीं, ये दर्द तूने दिया है तो कोई बात नहीं, किसे मजाल कहे कोई मुझको दीवाना, अगर ये तुमने कहा है तो कोई ब...

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तहलील ( मेरी माँ) अख्तर-उल-ईमान
तहलील ( मेरी माँ) अख्तर-उल-ईमान

तहलील मेरी माँ अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है उसके जुमले, उसकी बातें , जब वह ज़िंदा थी, कितन...

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इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है- मुनिकेश सोनी
इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है- मुनिकेश सोनी

इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है। ये ज़िन्दगी इसको जीने के मक़सद अनेक है।। ना खाई ठोकरे वो रह गया नाकाम । ठोकरे खाकर सँभलने वाले अनेक हैं।।...

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जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था - कुंवर बैचैन
जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था - कुंवर बैचैन

जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था तो इस तरह राह में लूटने का डर न था जंगल में जंगलो की तरह का ...

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ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो - राज़िक़ अंसारी
ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो - राज़िक़ अंसारी

ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो रास्ते में कहीं क़याम न हो घर में रिश्ते बिखर चुके लेकिन दुश्मनों म...

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