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है गलत गर गुमान में कुछ है
तुझ सिवा भी जहान में कुछ है

दिल भी तेरे ही ढंग सिखा है
आन में कुछ है आन में कुछ है

बेखबर तेंगे-यार कहती है
बाकी नीमजान में कुछ है

इन दिनों कुछ अजब है मेरा हाल
देखता कुछ हू और ध्यान में कुछ है

और भी चाहिए सो कहिये अगर
दिले-नामेहरबाँ में कुछ है

दर्द तो जो करे है जी का जियाँ
फायदा इस जियान में कुछ है -ख्वाजा मीर दर्द

मायने
तेंगे-यार= प्रियतम कि तलवार, नीमजान=आधी जान, जियाँ=नुकसान

Roman

hai galat gar guman me kuch hai
tujh siwa bhi jahan me kuch hai

dil bhi tere hi dhang sikha hai
aan me kuch hai aan me kuch hai

bekhabar tenge-yaar kahti hai
baaki is neemjaan me kuch hai

in dino kuch ajab hai mera haal
dekhta kuch hu aur dhyan me kuch hai

aur bhi chahiye so kahiye agar
dile-namehrban me kuch hai

dard to jo kare hai ji ka jiyaa
fayda is jiyan me kuch hai - Khwaja Meer Dard
#jakhira
शाम का वक्त है शाख़ों को हिलाता क्यू है ?
तू थके मांदे परिन्दों को उड़ाता क्यू है ?

वक्त को कौन भला रोक सका है पगले,
सूइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यू है ?

स्वाद कैसा है पसीने का, ये मज़दूर से पूछ
छांव में बैठ के अंदाज लगाता क्यू है ?

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिए फिर हाथ बढ़ाता क्यू है ?

प्यार के रूप हैं सब, त्याग तपस्या पूजा
इनमें अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यू है ?

मुस्कुराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार
इसका मतलब मेरे सुख दुख से लगाता क्यू है ?

देखना चैन से सोना न कभी होगा नसीब
ख़्वाब की तू कोई तस्वीर बनाता क्यू है ? - कृष्ण कुमार नाज़

Roman

Sham ka waqt hai shakho ko hilata kyu hai
tu thake mande parindo ko udata kyu hai?

waqt ko koun bhala rok saka hai pagle,
suiya ghadiyo ki tu piche ghumata kyu hai

swad kaisa hai pasine ka, ye majdoor se puch
chhanv me baith ke andaj lagata kyu hai?

mujhko seene se lagane me hai touhin agar
dosti ke liye phir haath badata kyu hai?

payar ke roop hai sab, tyag, tapsya, pooja
inme antar ka koi prashan uthata kyu hai?

muskurna hai mere hotho ki aadat me shumar
iska matlab mere sukh-dukh se lagata kyu hai?

dekhna chain se sona n kabhi hoga naseeb
khwab ki tu tasweer banata kyu hai? - Krishna Kumar Naaz
#jakhira

हमद फ़राज़, शायरी को पढ़ने और समझने वाला शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा जो इस नाम से परिचित नहीं होगा | आपका जन्म पकिस्तान के (कोहत) नौशेरा शहर में 12, जनवरी, 1931 को हुआ | आप अपने समय के महानतम शायरों में से एक है | आपका असल नाम सैय्यद अहमद शाह था आपके पिताजी सैय्यद मुहम्मद शाह बर्क एक शिक्षक थे | आपके भाई सैय्यद मसूद कौसर ने रेडिफ.काम को दिए साक्षात्कार में बताया कि कैसे उनके पिताजी उनके लिए कपडे लाए और उन्होंने उसे अपने भाई साहब कौसर को दे दिए थे और तब उन्होंने पहली बार अशआर कहे थे कि,


सब के वास्ते लाए है कपडे सेल से
लाए है मेरे लिए कैदी का कम्बल जेल से

आप गणित और भूगोल में कमजोर थे | उनके वालदैन छुट्टियों में उनके सहपाठियों से मदद लेने को कहते थे जिसे उन्होंने कभी नही माना |
वे "हाजी बहादर" (सैयद) जो के (कोहत के ही जाने माने पीर) के खानदान से थे और समाज में इनकी काफी इज्जत भी थी | बाद में ये लोग पुरे परिवार सहित पेशावर चले गए, जहां इनकी तालीम मशहूर "एडवर्ड कॉलेज " में हुई, उसके बाद उन्होंने पेशावर युनिवर्सिटी से मास्टर इन उर्दू और मास्टर इन परसियन (फारसी) की डिग्री ली |
आप पढाई के बाद पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डायरेक्टर, पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज ऑफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे |
आपने कालेज के वक्त फैज़ और अली सरदार जाफरी से प्रेरित होकर जिया उल हक़ के समय कुछ इंकलाबी गज़ले कही जिस कारण से उन्हें कुछ समय तक जेल में और फिर पकिस्तान से दूर कनाडा और कई देशो में दिन गुजारने पड़े |
उनकी शायरी की विशेषता यह थी कि वे काफी सरल और स्पष्ट लफ्जों में गहरी से गहरी बात कह देते थे और बाकि काम उनका सजीला व्यक्तित्व कर देता था | फ़राज़ साहब कि एक मशहूर गज़ल जिसे मेहँदी साहब ने अपनी आवाज़ दी है " रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ "
यह गज़ल इतनी मशहूर हुई कि लगभग मेहँदी साहब की ही होकर रह गयी |

पाकिस्तान में रहने वाले फराज़ आधे पाकिस्तानी और आधे हिन्दुस्तानी थे | फराज़ की शायरी में रोमांस और इंकलाब दोनों मौजूद थे। यही वजह है कि समय-समय पर उन्होंने पाकिस्तानी हुकूमत की जन विरोधी नीतियों की मुख़ालत की और इसके लिए परेशानियां भी झेलीं। उन्हें 2004 में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाले-इम्तियाज़ दिया गया जिसे बाद में विरोध प्रकट करते हुए उन्होंने वापस कर दिया |

नेशलन काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के निदेशक डॉ. अली जावेद ने फराज़ को याद करते हुए कहा "आज के दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है। पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा वह काबिले तारीफ है।"

नामचीन शायर मुनव्वर राणा ने कहा कि फराज़ के एक शेर "
ये रसूलों की किताबें ताक़ पर रख दो फराज़,
नफरतों के ये सहीफे उम्र भर देखेगा कौन"
पर कट्टरपंथियों ने हंगामा कर दिया था जिस पर उन्हें ढाई साल तक वतन छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा रोमांटिक शायर अहमद फराज साहब की मकबूलियत का कोई सानी नहीं है।
एक किस्सा याद करते हुए उन्होंने बताया कि एक दफा अमेरिका में उनका मुशायरा था जिसके बाद एक लड़की उनके पास आटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने कहा फराज़ा
फराज़ ने चौंककर कहा यह क्या नाम हुआ!? तो बच्ची ने कहा "मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे। लेकिन बेटी पैदा हो गयी तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया।"

इस बात पर उन्होंने लिखा
"और फराज़ चाहिए कितनी मोहब्बतें तुझे,
मांओ ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया"

आपको "हिलाल -ए - इम्तियाज़", "सितारे -ए -इम्तियाज़" और मृत्यु के बाद "हिलाले -ए -पाकिस्तान" जैसे ओहदों से नवाजा गया |
इस महान शायर की मृत्यु किडनी फेल हो जाने की वजह वक्त से कही पहले 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद में हुई |
#jakhira
क्या हुआ जो बात करना हमको आया ही नहीं
फिर भी चेहरे पर कोई चेहरा लगाया ही नहीं

आप तो क्या चीज़ है पत्थर पिघल जाते है जनाब
गीत कोई दिल से अब तक हमने गाया ही नहीं

रोज आता है यहाँ वो रात के पिछले पहर
नींद से लेकिन कभी उसने जगाया ही नहीं

मुस्कुराया वो मेरे कुछ पूछने पर इस तरह
कुछ बताया भी नहींलेकिन छुपाया भी नहीं

क्या डराएगा कोई साया हमें "कैफी" यहाँ
उसके हम बंदे है साहिब! जिसका साया ही नहीं - हबीब कैफी

Roman

kya hua jo baat karna hamko aaya hi nahi
phir bhi chehre par koi chehra lagaya hi nahi

aap to kya cheez hai patthar pighal jate hai janab
geeet koi dil se ab tak hamne gaya hi nahi

roj aata hai yaha wo raat ke pichle pahar
nind se lekin kabhi usne jagaya hi nahi

muskuraya wo mere kuch puchne par is tarah
kuch bataya bhi nahi lekin chupaya bhi nahi

kya darayega koi saya hame "Kaifi" yaha
uske ham bande hai sahib! jiska saya hi nahi - Habib Kaifi
#jakhira
दाम फ़ैलाये हुए हिर्सो-हवा हैं कितने
एक बंदा है मगर उसके ख़ुदा हैं कितने

इक-इक ज़र्रे में पोशीदा हैं कितने ख़ुर्शीद
इक-इक क़तरे में तूफ़ान बपा हैं कितने

चंद हँसते हुए फूलों का चमन नाम नहीं
गौर से देख की पामाले-सबा हैं कितने

उनसे नाकर्दा ज़फ़ाओं का किया था इसरार
इतनी सी बात पे वो हमसे ख़फ़ा हैं कितने

गामज़न हो के ये उक़्दा तो खुला है 'रौशन'
रहज़न कितने हैं और रहनुमा हैं कितने -  रौशन नगीनवी

मायने 
दाम =जाल ;हिर्सो-हवा=लोभ और लालच ;पोशीदा =छिपे हुए ; ख़ुर्शीद =सूरज ;बपा=उपस्थित;पामाले-सबा=हवा के पाँव तले रौंदे हुए ;नाकर्दा ज़फ़ाओं=न किये हुए अत्याचार ;इसरार =हठ ; गामज़न =चलता हुआ ; उक़्दा =गुत्थी /उलझा

Roman

dam failaye hue hurso-hawa hai kitne
ek banda hai magar uske khuda hai kitne

ik-ik zarre me poshida hai kitne khurshid
ik-ik katre me tufan bapa hai kitne

chand haste huye fulo ka chaman naam nahi
gour se dekh ki pamale-saba hai kitne

unse nakrda zafao ka kiya tha israr
itni si bat pe wo hamse khafa hai kitne

gamzan ho ke ye ukda to khula hai "Roushan"
rahjan kitne hai aur rahnuma hai kitne - Roushan Naginvi
#jakhira
झूठ कैसे हलक से उतरे निवाले की तरह
मेरी गैरत चीखती है मुह के छाले की तरह

प्यास की शिद्दत से मुह खोले परिंदा गिर पड़ा
सीढियों पर हाफ्ते अखबार वाले की तरह

ऐसे मौसम में बरहना फिर रहा हू मै कि जब
ओढ़ लेता है शज़र पत्ते दुशाले की तरह

एक कैदी की तरह मेरी अना बेबस रही
ख्वाहिशे घेरे रही मकड़ी के जाले की तरह

इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे सहमे से चरागों के उजाले की तरह - मुनव्वर राणा

मायने
शिद्दत=तेजी, बरहना=नग्न, शज़र=पेड़, अना=स्वाभिमान

Roman

jhuth kaise halak se utre niwale ki tarah
meri gairat chikhti hai muh ke chhale ki tarah

pyas ki shiddat se muh khole parinda gir pada
sidhiyo par hafte akhbaar wale ki tarah

aise mousam me barhana fir raha hu mai ki jab
odh leta hai shazar patte dushale ki tarah

ek kaidi ki tarah meri ana bebas rahi
khwahishe ghere rahi makdi ke jale ki tarah

ik sulgate shahar me bachcha mila hasta hua
sahme sahme se charago ke ujale ki tarah - Munwwar Rana
#jakhira