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Gurpreet Kafir
इंसानियत का कत्ल सरेआम हो रहा है,
अभी चुप रहो तुम, आवाम सो रहा है ।

हो धरम या सियासत बस एक ही कहानी
हाथों में छुरी ले के राम राम हो रहा है ।

हर बात अदाकारी क्या खूब राजनीती
कानून बनाने का, शायद काम हो रहा है ।

घर से तो चाहे निकलो, पर उस तरफ न जाना
भगवान सो रहे हैं, आराम हो रहा है ।

हमने न कभी देखा हमने न कभी जाना
सुनते हैं हर गली में अपना नाम हो रहा है

बारूद की महक चारों तरफ है फैली
"काफ़िर" को उडाने का ताम झाम हो रहा है । -गुरप्रीत काफिऱ

Roman

insaniyat ka katl sareaam ho raha hai
abhi chup raho tum, awam so raha hai

ho dharam ya siyasat bas ek hi kahani
hatho me churi le ke ram ram ho rha hai

har baat adakari kya khoob rajniti
kanoon banane ka, shayad kam ho raha hai

ghar se to chahe niklo, par us taraf n jana
bhagwan so rahe hai, aaram ho rha hai

hamne n kabhi dekha hamne n kabhi jana
sunte hai har gali me apna naam ho rha hai

barud ki mahak charo taraf hai faili
kafir ko udane ka tam jham ho raha hai -Gurpreet Kafir
#jakhira
रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम, तुम से तू होने लगी

मेरी रुसवाई की नौबत आ गयी
शोहरत उनकी कूबकू होने लगी

अब के मिल के देखिये क्या रंग हो
फिर हमारी जुस्तजू होने लगी

दाग़ इतराए हुए फिरते है आज
शायद उनकी आबरू होने लगी - दाग देहलवी
मायने
रुसवाई = बदनामी, कूबकू=गली-गली, जुस्तजू=तलाश

Roman

ranj ki jab guftgu hone lagi
aap se tu, tum se tu hone lagi

meri ruswai ki noubat aa gayi
shohrat unki koobkoo hone lagi

ab ke mil ke dekhiye kya rang ho
phir hamari justjoo hone lagi

daag itraye hue firte hai aaj
shayad unki aabru hone lagi - Daag Dehlavi
#jakhira
आज ही के दिन 24 जुलाई 1991 को ठीक 24 साल पहले शायर कैफ भोपाली साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए और अपनी यादो उनके मुरीदो के लिए छोड़ गए उनकी एक मशहूर ग़ज़ल आप सबके लिए पेश है
उसका अंदाज है अभी तक लड़कपन वाला
मीठा लगता है उसे नीम वो आँगन वाला

अब भी मेरे लिए चिलमन से निकल आता है
सावला फूल सा इक हाथ वो कंगन वाला

बिजलियाँ आँखों की जुल्फों की घटाए लेकर
तुम चले आओ तो मौसम रहे सावन वाला

ताके बिछड़े तो बिछड़ने का कुछ अहसास न हो
हम से रक्खो तौर तरीका कोई दुश्मन वाला- कैफ भोपाली

Roman

uska andaaz hai abhi tak ladakpan wala
metha lagta hai use neem wo aangan wala

ab bhi mere liye chilman se nikal aata hai
sawla phool sa ik haath wo kangan wala

bijliya aankho ki zulfo ki ghataye lekar
tum chale aao to mousam rahe sawan wala

taake bichhde to bichhdane ka kuch ahsaas n ho
ham se rakkho tour tarika koi dushman wala - Kaif Bhopali
#jakhira
गरीबे शहर का सर है के शहरयार का है
ये हमसे पूछ के गम कौन सी कतार का है

किसी की जान का, न मसला शिकार का है
यहाँ मुकाबला पैदल से शहसवार का है

ऐ आबो-ताबे-सितम, मश्क क्यू नहीं करता
हमें तो शौक भी सेहरा-ए-बेहिसार का है

यहाँ का मसला मिटटी की आबरू का नहीं
यहाँ सवाल जमीनों पे इख्तियार का है

वो जिसके दर से कभी जिंदगी नहीं देखी
ये आधा चाँद उसी शहरे-यादगार का है

ये ऐसा ताज है जो सर पे खुद पहुचता है
इसे जमीन पे रख दो ये खाकसार का है - अहमद कमाल 'परवाजी'

मायने
शहरयार=बादशाह, मसला=समस्या, ऐ-आबो-ताबे-सितम=जुल्म करने वाला, मश्क=अभ्यास, सेहरा-ए-बेहिसर=जिसकी कोई हद नहीं, आबरू=मान, इख्तियार/अख्तियार=अधिकार

Roman

garibe shahar ka sar hai ke shaharyaar ka hai
ye hamse puch ke gam koun si kataar ka hai

kisi ki jaan ka, n masla shikar ka hai
yaha mukabala paidal se shahsawar ka hai

ae aabo-tabe-sitam, mashq kyu nahi karta
hame to shouk bhi sehra-e-behisar ka hai

yaha ka masala mitti ki aabru ka nahi
yaha sawal jamino pe ikhtiyar ka hai

wo jiske dar se kabhi jindgi nahi dekhi
ye aadha chand usi shahre yaadgar ka hai

ye aisa taaj hai jo sar pe khud pahuchta hai
ise jamin pe rakh do ye khaksar ka hai - Ahmad Kamaal Parwaji/Parwazi
#jakhira



बुजुर्गो कि बाते बेमानी नहीं है
समझना उन्हें बस आसानी नहीं है

मोहब्बत में बेताबियो का है आलम
कभी रातभर नींद आनी नहीं है

मेरे हौसलों को डुबोकर दिखाए
समंदर में इतना पानी नहीं है

हवाओ के रुख भी पलट देंगे हम तो
अभी काम करने कि ठानी नहीं है

तुम बेकार ही उसके मुह लग रहे हो
वो बन्दा कोई खानदानी नहीं है

देखे है हमने हसी से हसी पर
मगर उसका अब तक तो सानी नहीं है

उसे ढूंढने कोई जाए भी कैसे?
कि जिसकी कोई भी निशानी नहीं है

जो बरसो से ही कर रहे हुक्मरानी
वो समझे है ये दुनिया फानी नहीं है

जमाना तेरी कद्र करता है लेकिन
उसे ही निरी कद्र आनी नहीं है

पढ़ा है सुना है ये दिल कह रहा है
कोई मीरा जैसी दिवानी नहीं है

बदल जाए गर वक्त के साथ रिश्ते
उन रिश्तों के फिर कोई मानी नहीं है

तेरी साफगोई है पहचान रौनक
तभी महफिलो की तू रानी नहीं है - रौनक रशीद खान

Roman

bujurgo ki baate bemani nahi hai
samjhana unhe bas aasani nahi hai

mohbbat me betabiyo ka hai aalam
kabhi ratbhar nind aani nahi hai

mere houslo ko dubokar dikhaye
samandar me itna paani nahi hai

hawao ke rukh bhi palat denge ham to
abhi kaam karne ki thani nahi hai

tum bekar hi uske muh lag rahe ho
wo banda koi khandani nahi hai

dekhe hai hamne hasi se hasi par
magar uska ab tak to sani nahi hai

use dhundhne koi jaye bhi kaise?
ki jiski koi bhi nishani nahi hai

jo barso se hi kar rahe hukmrani
wo samjhe hai ye duniya fani nahi hai

jamana teri kadra karta hai lekin
use hi niri kadr aani nahi hai

padha hai suna hai ye dil kah raha hai
koi meera jaisi deewani nahi hai

badal jaye gar waqt ke sath rishte
un rishto ke fir koi mani nahi hai

teri safgoi hai pahchan rounak
tabhi mahfilo ki tu rani nahi hai - Rounak Rashid Khan
#jakhira

उर्दू शायरी के बडे शायरो में शुमार किये जाने वाले शायर बशर नवाज साहब का 9 जुलाई 2015 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में निधन हो गया । आपका यह गीत सभी शायरी पसंद करने वालो के लिए और उन्हें समर्पित इस गीत को उन्होंने बाजार फिल्म के लिए लिखा था जिससे उन्हें बहुत नाम और शोहरत हासिल हुई ।

करोगे याद तो हर बात याद आयेगी
गुज़रते वक्त की हर मोज़ ठहर जायेगी
करोगे याद तो, हर बात याद आयेगी
गुज़रते वक़्त की, हर मौज ठहर जायेगी

ये चाँद बीते ज़मानों का आईना होगा
भटकते अब्र में, चहरा कोई बना होगा
उदास राह कोई दास्तां सुनाएगी

बरसता-भीगता मौसम धुआँ-धुआँ होगा
पिघलती शमों पे दिल का मेरे ग़ुमां होगा
हथेलियों की हिना, याद कुछ दिलायेगी

गली के मोड़ पे, सूना सा कोई दरवाज़ा
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी -बशर नवाज़

Roman

Karoge yaad to har baat yaad aayegi
Gujrate waqt ki har mouj thahar jayegi
Karoge yaad to har baat yaad aayegi

Gujrate waqt ki har mouj thahar jayegi
Ye chand beete zamano ka aaina hoga
Bhatkate abr me, chahra koi bana hoga
Udas rah koi dasta sunaeagi


Barsata bhigta mousam dhuaa dhuaa hoga
Pighlati shamo pe dil ka mere guma hoga
Hatheliyo ki hina, yaad kuch dilayegi

Gali ke mod pe , suna sa koi darwaja
Tarsati aankho se rasta kisi ka dekhega
Nigah door talak ja ke lout aayegi -Bashar Nawaz
#jakhira