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हैरत-ए-इश्क का इल्जाम दिया जा सकता - अब्दुल हमीद अदम

हैरत-ए-इश्क का इल्जाम दिया जा सकता हैरत-ए-इश्क का इल्जाम दिया जा सकता काश इस शय को कोई नाम दिया जा सकता अक्ल-ए-बीमार को मयखाने में ले ही आते ताकि बदबख्त को इक जाम दिया जा सकता जाने वालो को किसी ढंग से रुखसत करते आने वालो को कुछ आराम दिया …

खुदा तो खैर मुस्लमा था

खुदा तो खैर मुस्लमा था आज़ादी के समय के आसपास लिखे गये तीन शेरो के बारे में पढते है जिनके बारे में मशहूर शायर निदा फाज़ली लिख रहे है और विश्लेषण कर रहे है | जगन्नाथ आज़ाद भारतीय साहित्य का जाना पहचाना नाम है| शायरी विरासत में मिली| उनके पिता डाक्…

हस के बोला करो, बुलाया करो - अब्दुल हमीद अदम

हस के बोला करो, बुलाया करो हस के बोला करो, बुलाया करो आप का घर है, आया जाया करो मुस्कराहट है हुस्न का जेवर रूप बढ़ता है, मुस्कुराया करो हद से बढ़ कर हसीन लगते हो झूठी कसमे जरुर खाया करो हुक्म करना भी एक सख़ावत है हमको खिदमत कोई बताया करो …

जो लोग जान बूझ के नादान बन गए - अब्दुल हमीद अदम

जो लोग जान बूझ के नादान बन गए जो लोग जान बूझ के नादान बन गये मेरा ख़याल है कि वो इंसान बन गये हम हश्र में गये मगर कुछ न पूछिये वो जान बूझ कर वहाँ अन्जान बन गये हँसते हैं हम को देख के अरबाब-ए-आगही हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गये मझधार तक प…

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