कोरोना और सोशल डिस्टेन्सिंग पर कुछ खूबसूरत शेर | जखीरा, साहित्य संग्रह

कोरोना और सोशल डिस्टेन्सिंग पर कुछ खूबसूरत शेर

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तुम आज हाथों से दूरियाँ नापते हो सोचो दिलों में किस दर्जा फ़ासला था वबा से पहले - अंबरीन हसीब अंबर दुनिया तो हम से हाथ मिलाने को आई थी हम न...

तुम आज हाथों से दूरियाँ नापते हो सोचो
दिलों में किस दर्जा फ़ासला था वबा से पहले
- अंबरीन हसीब अंबर



दुनिया तो हम से हाथ मिलाने को आई थी
हम ने ही एतिबार दोबारा नहीं किया
- अंबरीन हसीब अंबर



एक कमरे में सिमट आई है सारी दुनिया
रह गए ख़ानों में बट कर कि वबा के दिन हैं
- अक़ील अब्बास जाफ़री



रहिए अहबाब से कट कर कि वबा के दिन हैं
साँस भी लीजिए हट कर कि वबा के दिन हैं
- अक़ील अब्बास जाफ़री



शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं
क्या बला उतरी है क्यूँ दीवार-ओ-दर ख़ामोश हैं
- अज़हर नक़वी



अब हिफ़ाज़त जितनी है महबूस हो जाने में है
ख़ुद के बाहर घूमने फिरने का अब मौक़ा नहीं
- अरशद अब्दुल हमीद



मुमकिन है यही दिल के मिलाने का सबब हो
ये रुत जो हमें हाथ मिलाने नहीं देती
- अरशद जमाल सारिम



जो धर्म पे बीती देख चुके, ईमां पे जो गुजरी देख चुके
इस रामो-रहीम की दुनिया में, इंसान का जीना मुश्किल है
- अर्श मलसियानी



वबा के दिनों में मोहब्बत करने वाले लोग
अलविदाई बोसे का हक़ खो देते हैं
- अली साहिल



मरज़ ये क्या है कि जिस के डर से तमाम दुनिया लरज़ रही है
ये क्या वबा है कि जिस के आगे हर एक का सर झुका हुआ है
- असलम गुरदासपुरी



वो सब मीज़ाइल ये सारे एटम बस इक क्रोना की मार निकले
अब ऐसे आलम में देख लें सब कि चीन कैसे डटा हुआ है
- असलम गुरदासपुरी



क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी है अभी
- अहमद फ़राज़



खौफ, डर, बेचैनियां, घबराहटें,
क्या अजब है वक्त,चुप हैं आहटें
- अनिल पठानकोटी



बुरा हो लॉक डाउन का, मुझे इस वक्त रातों में,
मेरे महबूब की ज़ुल्फ़ों का साया याद आता है।
- आदर्श बाराबंकवी



इन दूरियों ने और बढ़ा दी हैं क़ुर्बतें
सब फ़ासले वबा की तवालत से मिट गए
- ऐतबार साजिद



एक ही शहर में रहना है मगर मिलना नहीं
देखते हैं ये अज़िय्यत भी गवारा कर के
- ऐतबार साजिद



हाल पूछा न करे हाथ मिलाया न करे
मैं इसी धूप में ख़ुश हूँ कोई साया न करे
- काशिफ़ हुसैन ग़ाएर



कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
- बशीर बद्र



क्या खुद पर या अपनों पर ही बीतेगी तब जागोगे
अभी वक्त है होश में आओ लाचारी ले डूबेगी
- चन्दन देहरिया



ज्यादा दानिश बनने वालो हुश्यारी ले डूबेगी
तेज़ी से जो फ़ैल रही है बीमारी ले डूबेगी
- चन्दन देहरिया



इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ।
- दुष्यंत कुमार



दर्द का भी अजीब किस्सा है। हाल पूछो तभी उभरता है।

दर्द का भी अजीब किस्सा है।
हाल पूछो तभी उभरता है।
- देवेन्द्र आर्य



आंख भर देख लो ये वीराना
आजकल में ये शहर होता है
- फरहत एहसास



घर रहिए कि बाहर है इक रक़्स बलाओं का
इस मौसम-ए-वहशत में नादान निकलते हैं
- फ़रासत रिज़वी



वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
- हफ़ीज़ मेरठी



वो कौन था जो हाथ मिला कर निकल गया
बरपा हिसार-ए-जिस्म में कोहराम क्यूँ हुआ
- हमदम कशमीरी



मेरी बर्बादी में था हाथ कोई पोशीदा
उस ने जब हाथ मिलाया तो मुझे याद आया
- हैरत फ़र्रुख़ाबादी



अब तो मुश्किल है किसी और का होना मिरे दोस्त
तू मुझे ऐसे हुआ जैसे क्रोना मिरे दोस्त
- इदरीस बाबर



टेंशन से मरेगा न क्रोने से मरेगा
इक शख़्स तिरे पास न होने से मरेगा
- इदरीस बाबर



हम हाथ नहीं मिलाएँगे
ये वक़्त दिलों को मिलाने का है
- इफ़्तिख़ार बुख़ारी



दो चार गज़ के फ़ासले से मुस्कुरा के देख
दो चार गज़ के फ़ासले तक आ के लौट जा
- इफ़्तिख़ार हैदर



भूक से या वबा से मरना है
फ़ैसला आदमी को करना है
- इशरत आफ़रीं



ऐसी तरक़्क़ी पर तो रोना बनता है
जिस में दहशत-गर्द क्रोना बनता है
- इसहाक़ विरदग



बाज़ार हैं ख़ामोश तो गलियों पे है सकता
अब शहर में तन्हाई का डर बोल रहा है
- इसहाक़ विरदग



दिल तो पहले ही जुदा थे यहाँ बस्ती वालो
क्या क़यामत है कि अब हाथ मिलाने से गए
- ईमान क़ैसरानी



आज तक बनते रहे हैं जो हमारे ज़ामिन
उन से हम हाथ मिलाने से भी महरूम रहे
- जगदीश प्रकाश



इंसानियत खुद अपनी निगाहों में है ज़लील
इतनी बुलंदियों पे तो इंसा न था कभी
- जगन्नाथ आज़ाद



ख़तरा तो मुफ़्त में भी नहीं लेना चाहिए
घर से निकल के मोल न लो फ़ासला रखो
- जव्वाद शैख़



रखने की बस ये तीन ही चीज़ें हैं इन दिनों
हिम्मत रखो यक़ीन रखो फ़ासला रखो
- जव्वाद शैख़



सब को बचाओ ख़ुद भी बचो फ़ासला रखो
अब और कुछ करो न करो फ़ासला रखो
- जव्वाद शैख़



मेरे खुदा तुझे अब यह भी सोचना होगा
करम किया कि सितम आदमी बना के मुझे
- जावर फतहपुरी



ये कह के उस ने मुझे मख़मसे में डाल दिया
मिलाओ हाथ अगर वाक़ई मोहब्बत है
- जावेद सबा



ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथ,
ऐसा न हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ
- जावेद सबा



मिल बैठ के वो हंसना वो रोना चला गया
अब तो कोई ये कह दे करोना चला गया
- ज़िया ज़मीर



अब नहीं कोई बात ख़तरे की
अब सभी को सभी से ख़तरा है
- जौन एलिया



हम को यारों ने याद भी न रखा
जौन यारों के यार थे हम भी
- जौन एलिया



जीने वालो को क्या खबर इसकी
मरने वाले किधर से गुजरे है
- क़मर शेरवानी



अब रसूल आएँगे दुनिया में न राम आएँगे,
सिर्फ़ इंसान ही इंसान के काम आएँगे
- कृष्ण बिहारी नूर



जहाँ जो था वहीं रहना था उस को
मगर ये लोग हिजरत कर रहे हैं
- लियाक़त जाफ़री



सुर्ख़ियाँ ख़ून में डूबी हैं सब अख़बारों की
आज के दिन कोई अख़बार न देखा जाए
- मख़मूर सईदी



ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं
ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं
- माहिर-उल क़ादरी



कौन कहता है कि ज़िंदगी बिकती नहीं है?
मैंने दवाइयों... की दुकानो पर क़तारें देखीं हैं!
- मिथिलेश बारिया



कैसा चमन कि हम से असीरों को मनअ’ है,
चाक-ए-क़फ़स से बाग़ की दीवार देखना
- मीर तक़ी मीर



आंखों में उड़ रही है लुटी महफ़िलों की धूल
इबरत सराए दहर है और हम हैं दोस्तो
- मुनीर नियाज़ी



इक बला कूकती है गलियों में
सब सिमट कर घरों में बैठ रहें
- मोहम्मद जावेद अनवर



अकेला हो रह-ए-दुनिया में गिर चाहे बहुत जीना,
हुई है फ़ैज़-ए-तन्हाई से उम्र-ए-ख़िज़्र तूलानी
- मोहम्मद रफ़ी सौदा



यदि कोरोना से बचा सन्त्रास से मर जायेगा,
भूख लाचारी घुटन और प्यास से मर जायेगा।
- मूसा खान अशान्त बाराबंकवी



मैं वो महरूम-ए-इनायत हूँ कि जिस ने तुझ से
मिलना चाहा तो बिछड़ने की वबा फूट पड़ी
- नईम जर्रार अहमद



डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है
- नज़ीर अकबराबादी



अजनबी रंग छलकता हो अगर आँखों से
उन से फिर हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या है
- नदीम गुल्लानी



कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए
लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता
- नसीर तुराबी



कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है

कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए
रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
- नासिर काज़मी



चहकते बोलते शहरों को क्या हुआ नासिर
कि दिन को भी मिरे घर में वही उदासी है
- नासिर काज़मी



कौन तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे
यह भरा शहर भी तन्हा नज़र आता है मुझे
- नूर जहां सर्वत



बोझ उठाते हुए फिरती है हमारा अब तक
ऐ ज़मीं मां तेरी यह उम्र तो आराम की थी
- परवीन शाकिर



शहर-ए-जाँ में वबाओं का इक दौर था,
मैं अदा-ए-तनफ़्फ़ुस में कमज़ोर था
- पल्लव मिश्रा



अपने ख़िलाफ़ फैसला ख़ुद ही लिखा है आपने
हाथ भी मल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं
- पीरज़ादा क़ासिम



आप ही आप दिए बुझते चले जाते हैं,
और आसेब दिखाई भी नहीं देता है
- रज़ी अख़्तर शौक़



जानता हूँ बता नहीं सकता
जिंदगी किस तरह हुई बर्बाद
- राज चाँदपूरी



मौत का ज़हर है फिज़ाओ में
अब कहाँ जाके सांस ली जाए
- राहत इंदौरी



जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है
इश्क़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए
- सऊद उस्मानी



मुझे ये सारे मसीहा अज़ीज़ हैं लेकिन
ये कह रहे हैं कि मैं तुम से फ़ासला रक्खूँ
- सऊद उस्मानी



हर एक जिस्म में मौजूद हश्त-पा की तरह,
वबा का ख़ौफ़ है ख़ुद भी किसी वबा की तरह
- सऊद उस्मानी



अफ़्सोस ये वबा के दिनों की मोहब्बतें
इक दूसरे से हाथ मिलाने से भी गए
- सज्जाद बलूच



वक़्त के साथ ‘सदा’ बदले तअल्लुक़ कितने
तब गले मिलते थे अब हाथ मिलाया न गया
- सदा अम्बालवी



मौत आ जाए वबा में ये अलग बात मगर
हम तिरे हिज्र में नाग़ा तो नहीं कर सकते
- साबिर आफ़ाक़



जाने वाले कभी नहीं आते
जाने वालो की याद आती है
- सिकंदर अली वज्द



अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे
क़ैद का सामाँ किया और उस को घर कहने लगे
- शबनम रूमानी



घूम-फिर कर न क़त्ल-ए-आम करे
जो जहाँ है वहीं क़याम करे
- शब्बीर नाज़िश



लोग नज़रें भी चुराने लगे हम-सायों से
दरमियाँ फ़ासला रखने का चलन क्या निकला
- शहपर रसूल



बे-नाम से इक ख़ौफ़ से क्यों दिल है परेशां
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
- शहरयार



रात को दिन से मिलाने की हवस थी हमको
काम अच्छा न था अंजाम भी अच्छा न हुआ
- शहरयार



शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,
सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा
- शहरयार



घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है,
तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं
- शारिक़ कैफ़ी



तुम्हारी मौत ने मारा है जीते जी हमको
हमारी जान भी गोया तुम्हारी जान में थी
- शकील आज़मी



जी तो कहता है कि बिस्तर से न उतरूँ कई रोज़
घर में सामान तो हो बैठ के खाने के लिए
- शकील जमाली



इश्क़ की म"आनिंद जैसे कोरोना हो गया
जिस किसी को भी हुआ बस रोना हो गया।
- शायर शानू भोपाली



तमाम शहर न जीने में है न मरने में
ये इस तरह के अधूरे गुनाह किस ने किए..
- शारिक़ कैफ़ी



वबा के दिनों में किसे होश रहता है
किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है
- तहज़ीब हाफ़ी



घर तो ऐसा कहां का था लेकिन
दर-बदर हैं तो याद आता है
- उम्मीद फ़ाज़ली



हर एक जिस्म में मौजूद हश्त-पा की तरह
वबा का ख़ौफ़ है ख़ुद भी किसी वबा की तरह
- ऊद उस्मानी



कोई दवा भी नहीं है यही तो रोना है
सद एहतियात कि फैला हुआ क्रोना है
- वजीह सानी



बंद हैं मंदिर ओ मस्जिद की दुकानें सारी
आज बाज़ार ये सुनसान है घर में रहिए
- विनीत आश्ना



भीड़ में भी न थे सीने से लगाने वाले
आज तो शहर ही वीरान है घर में रहिए
- विनीत आश्ना



सब ज़रूरत का तो सामान है घर में रहिए
क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए
- विनीत आश्ना



हर मरज़ में नहीं होती है सुहूलत इतनी
भूक से मरना तो आसान है घर में रहिए
- विनीत आश्ना



थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते,
कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते
- ज़फ़र इक़बाल



रास्ते हैं खुले हुए सारे,
फिर भी ये ज़िंदगी रुकी हुई है
- ज़फ़र इक़बाल



सबको आफत से हम बचाएंगे,
बेसबब हाथ न मिलाएंगे
- जियाउर रहमान जाफरी



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जखीरा, साहित्य संग्रह: कोरोना और सोशल डिस्टेन्सिंग पर कुछ खूबसूरत शेर
कोरोना और सोशल डिस्टेन्सिंग पर कुछ खूबसूरत शेर
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जखीरा, साहित्य संग्रह
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