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हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब

हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है उस से मेरा मह-ए-ख़ुर्शीद-जमाल अच्छा है बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया साग…

मिर्ज़ा ग़ालिब जीवन परिचय

मिर्ज़ा ग़ालिब जीवन परिचय मिर्ज़ा ग़ालिब का असल नाम मिर्ज़ा असद उल्ला बैग खान था | आपका जन्म 27 दिसम्बर, 1796 ई. को अकबराबाद में हुआ जो कि अब आगरा के नाम से जाना जाता है | उनके दादा कौकान बेग खां, शाह आलम के अहद ( शासन काल) में समरकंद से आगरा ( अकबराबाद)…

ग़ालिब और इज़ारबंद की गाँठें

ग़ालिब और इज़ारबंद की गाँठें इतिहास सिर्फ़ राजाओं और बादशाहों की हार-जीत का नहीं होता. इतिहास उन छोटी-बड़ी वस्तुओं से भी बनता है जो अपने समय से जुड़ी होती हैं और समय गुज़र जाने के बाद ख़ुद इतिहास बन जाती हैं | ये बज़ाहिर मामूली चीज़ें बहुत ग़ैरमामू…

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें - मिर्ज़ा ग़ालिब

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें चल निकलते जो मय पिए होते क़हर हो या बला हो जो कुछ हो काश के तुम मिरे लिए होते मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था दिल भी या-रब कई दिए होते आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब' को…

ग़ालिब के लतीफे - 5

ग़ालिब के लतीफे 1. किसी ने उमराव सिंह नामी एक शागिर्द कि दूसरी बीवी के मरने का हाल मिर्ज़ा को लिखा और उसमे यह भी लिखा कि उसके नन्हे नन्हे बच्चे है | अब अगर तीसरी शादी न करे तो क्या करे | मिर्ज़ा ने इसके जवाब में यह लिखा कि अल्लाह ! अल्लाह ! एक वे है ज…

ग़ालिब के लतीफे - 4

ग़ालिब के लतीफे 1. जाड़े का मौसम था । तोते का पिंजरा सामने रखा था । सर्द हवा चल रही थी । तोता सर्दी के कारण परों में मुँह छिपाए बैठा था । मिर्ज़ा ने देखा और उनकी अन्दर की जलन बाहर निकली । बोले- "मियाँ मिट्ठू! न तुम्हारे जोरू, न बच्चे । तुम किस …

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