
परवाज में कुछ है, कुछ पर तोल रहे है
परवाज में कुछ है, कुछ पर तोल रहे है,उड़ जायेंगे पंछी जो यहाँ बोल रहे है |
करते है तुझे याद, जो ले-ले के तेरा नाम,
हमराज़ ही सब राज़ तेरा खोल रहे है |
साथी तो पहुच भी गए मंजिल पे कभी के,
हम है कि अभी शाख पे पर तोल रहे है |
खिल-खिल के कहा गुंचो ने रोज़ चमन में,
हम उम्दा-ए-हस्ती कि गिरह खोल रहे है |
ये अहद था फिर उनसे न बोलेंगे कभी हम,
मजबूर है इस दिल से मगर बोल रहे है | - बिस्मिल भरतपुरी
parwaz me kuchh hai, kuchh par tol rahe hai
parwaz me kuchh hai, kuchh par tol rahe hai,ud jayenge panchhi, jo yahan bol rahe hai
karte hai mujhe yaad, jo le-le ke tera naam
hamraz hi sab raaz tera khol rahe hai
sathi to pahuchh bhi gaye manzil pe kabhi ke
ham hai ki abhi shakh pe par tol rahe hai
khil-khil ke kaha guncho ne roz chaman me
ham umda-e-hasti ki girah khol rahe hai
ye ahad tha phir unse n bolenge kabhi ham
mazboor hai is dil se magar bol rahe hai - Bismil Bharatpuri
ग़ज़ल का मतला अच्छा लगा लेकिन खिल-खिल के कहा गुंचों ने रोज चमन में वाले मिसरे में.. कहा रोज की जगह..मुझे लगता है.... कहा इक रोज चमन में होना चाहिए.
धन्यवाद आपकी टिपण्णी के लिए परन्तु मैंने शायर की ग़ज़ल वैसी की वैसी ही लिखी है जैसी उन्होंने लिखी थी मैंने उसमे कोई फेरबदल नहीं किया है |