जिस तरह तन झुलसती गर्मी में - गुलज़ार

जिस तरह तन झुलसती गर्मी में ठंडे दरिया में डुबकियाँ ले कर दिल को राहत नसीब होती है

जिस तरह तन झुलसती गर्मी में

यह नज़्म गुलज़ार साहब ने अहमद नसीम कासमी (बाबा) के लिए लिखी है
जिस तरह तन झुलसती गर्मी में
ठंडे दरिया में डुबकियाँ ले कर
दिल को राहत नसीब होती है

ऐसा ही इत्मिनान होता है
तेरी अच्छी सी नज़्म को पढ़कर
लगता है ज़िन्दगी के दरिया में
एक तारी लगा के निकले हैं,
रूह कैसी निहाल होती है !
- गुलज़ार


jis tarah tan jhulasti garmi me

jis tarah tan jhulasti garmi me
thande dariya me dubkiya le kar
dil ko rahat naseeb hoti hai
aise hi itminan hota hai

teeri achchi si nazm ko padhkar
lagta hai zindgi ke dariya me
ek taari laga ke nikle hai
rooh kaise nihal hoti hai
- Gulzar

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