पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी

पुष्प की अभिलाषा - चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ। चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥ चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर,
हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली।
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥
- माखनलाल चतुर्वेदी


Pushp ki Abhilasha

chhah nahin mai surbala ke
gahno me gutha jaun
chaah nahin premi-mala me bindh
pyari ko lalchaun
chaah nahin samrato ke shav par
he hari dala jaun
chah nahi devo ke sir par
chahu bhagya par ithlaun
mujhe tod lena vanmali
us path me dena tum fek
matru-bhumi par sheesh chadhane
jis path jaye veer anek
- Makhanlal Chaturvedi

'पुष्प की अभिलाषा' कविता का संपूर्ण भावार्थ

इस कविता में कवि ने एक साधारण फूल के माध्यम से देशभक्ति और आत्मोत्सर्ग (बलिदान) की भावना को बेहद सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है।

फूल वन के माली से संवाद करते हुए कहता है कि उसके मन में सांसारिक सुखों, आकर्षणों या वैभव को पाने की कोई इच्छा नहीं है। वह नहीं चाहता कि उसे किसी देव-कन्या (अप्सरा) के सुंदर आभूषणों में गूँथा जाए, और न ही उसकी यह चाह है कि वह किसी प्रेमी की माला का हिस्सा बनकर प्रेमिका को रिझाने का माध्यम बने। फूल प्रेम और सौंदर्य के इन पारंपरिक बंधनों से मुक्त होना चाहता है।

आगे अपनी अनासक्ति को और स्पष्ट करते हुए फूल कहता है कि हे ईश्वर! मेरी यह भी अभिलाषा नहीं है कि मुझे बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं और सम्राटों के शवों पर सम्मान के रूप में अर्पित किया जाए। यहाँ तक कि वह धार्मिक मान-सम्मान को भी ठुकरा देता है; वह नहीं चाहता कि उसे देवताओं के सिर पर चढ़ाया जाए और वह इस बात पर घमंड करे कि उसका भाग्य कितना श्रेष्ठ है कि वह भगवान के चरणों या सिर तक पहुँच गया। वह राजकीय ठाठ-बाठ और धार्मिक अहंकार दोनों से दूर रहना चाहता है।

अंत में, फूल माली से अपनी एकमात्र और सच्ची इच्छा प्रकट करते हुए कहता है कि "हे वनमाली! तुम मुझे इस पौधे से तोड़ लेना और आदरपूर्वक उस मार्ग पर बिखेर देना, जिस रास्ते से होकर भारत माता के अनगिनत वीर सपूत अपनी मातृभूमि की रक्षा और उस पर अपना शीश न्योछावर करने के लिए गर्व से गुज़रते हैं।"

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