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नाम से गाँधी के चिढ़ बैर आज़ादी से है
नफ़रतों की खाद हैं उल्फ़त मगर खादी से है

आलिमों का इल्म से वो रब्त है इस दौर में
रब्त धोबी के गधे का जिस तरह लादी से है

ख़्वाब-ए-ग़फ़लत से वही निस्बत है मेरी क़ौम को
आशिक़ों का जो तअल्लुक़ दिल की बर्बादी से है

शौहरों से बीबियाँ लड़ती हैं छापा-मार जंग
राब्ता उन का भी क्या कश्मीर की वादी से है

देखना है अब यही देता है किस को कौन मात
सामना जनता का फिर कुर्सी के फ़रियादी से है

जैसे सय्यादों को सय्यादी से रहती है ग़रज़
काम उस्तादों को वैसे अपनी उस्तादी से है

बाप दादा के ही नुस्ख़े में है अपनी भी शिफ़ा
हम को देरीना तअल्लुक़ ख़ाना-दामादी से है

शर्म से होता नहीं है वास्ता बे-शर्म को
जो मुख़न्नस हो उसे क्या वास्ता शादी से है

दोस्तों की दोस्ती देखी है जब से ऐ 'ज़फ़र'
इश्क़ वीराने से है तो वहशत आबादी से है - ज़फ़र कमाली

मायने

आलिमो = जानकार/ज्ञानी, इल्म = ज्ञान, रब्त = लगाव, ख़्वाब-ए-ग़फ़लत = जिस तरह से ख्वाब में बेखबर होते है उस तरह बेखबर होना, निस्बत = रिश्ता, ख़ाना-दामादी = घर जमाई, मुख़न्नस = किन्नर

Roman

naam se gandhi ke chidh bair aazadi se hai
nafrato ki khaad hai ulfat magar khadi se hai

aalimo ka ilm se wo rabt hai is dour me
rabt dhobi ke gadhe ka jis tarah laadi se hai

khawab-e-gaflat se wahi nisbat hai meri kaum ko
aashiqo ka jo taaalluk dil ki barbadi se hai

shauharo se bibiyaN ladti hai chhapa-maar jung
rabta un ka bhi kya kashmir ki wadi se hai

dekhna hai ab yahi deta hai kis ko koun maat
samna janta ka phir kursi ke fariyadi se hai

jaise sayyado ko sayyadi se rahti hai garaj
kaam ustado ko waise apni ustadi se hai

baap dada ke hi nuskhe me hai apni bhi shifa
ham ko derina taalluk khana-damadi se hai

sharm se hota nahi hai wasta be-sharm ko
jo mukhannas ho use kya wasta shadi se hai

dosto ki dosti dekhi hai jab se ae "zafar"
ishq veerane se hai to wahshat aabadi se hai - Zafar Kamali
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