Alif Laila - 56 अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी | जखीरा, साहित्य संग्रह

Alif Laila - 56 अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी

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अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी Andhe Baba Abdulla Ki Kahani पिछली कहानी : Alif Laila - 55 खलीफा हारूँ रशीद और बाबा अब्दुल्ला की कहानी - अलिफ ...

Alif Laila अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी | Andhe Baba Abdulla Ki Kahani

अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी
Andhe Baba Abdulla Ki Kahani

पिछली कहानी : Alif Laila - 55 खलीफा हारूँ रशीद और बाबा अब्दुल्ला की कहानी - अलिफ लैला

कहानी सूची

बाबा अब्दुल्ला ने कहा कि मैं इसी बगदाद नगर में पैदा हुआ था। मेरे माँ बाप मर गए तो उनका धन उत्तराधिकार में मैंने पाया। वह धन इतना था कि उससे मैं जीवन भर आराम से रह सकता था किंतु मैंने भोग-विलास में सारा धन शीघ्र उड़ा दिया। फिर मैंने जी तोड़ कर धनार्जन किया और उससे अस्सी ऊँट खरीदे। मैं उन ऊँटों को किराए पर व्यापारियों को दिया करता था। उनके किराए से मुझे काफी लाभ हुआ और मैंने कुछ और ऊँट खरीदे और उनको साथ में ले कर किराए पर माल ढोने लगा।

एक बार हिंदुस्तान जानेवाले व्यापारियों का माल ऊँटों पर लाद कर मैं बसरा ले गया। वहाँ माल को जहाजों पर चढ़ा कर और अपना किराया ले कर अपने ऊँट ले कर बगदाद वापस आने लगा। रास्ते में एक बड़ा हरा-भरा मैदान देख कर मैंने ऊँटों के पाँव बाँध कर उन्हें चरने छोड़ दिया और खुद आराम करने लगा। इतने में बसरा से बगदाद को जानेवाला एक फकीर भी मेरे पास आ बैठा। मैंने भोजन निकाला और उसे साथ में आने को कहा। खाते-खाते हम लोग बातें भी करते जाते थे। उसने कहा, तुम रात-दिन बेकार मेहनत करते हो। यहाँ से कुछ दूर पर एक ऐसी जगह है जहाँ असंख्य द्रव भरा है। तुम इन अस्सी ऊँटों को रत्नों और अशर्फियों से लाद सकते हो। और वह धन तुम्हारे जीवन भर को काफी होगा।

मैंने यह सुन कर उसे गले लगाया और यह न जाना कि वह इससे कुछ स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। मैंने उससे कहा, तुम तो महात्मा हो, तुम्हें सांसारिक धन से क्या लेना-देना। तुम मुझे वह जगह दिखाओ तो मैं ऊँटों को रत्नादि से लाद लूँ। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें उनमें से एक ऊँट दे दूँगा। मैंने कहने को तो कह दिया किंतु मेरे मन में द्वंद्व होने लगा। कभी सोचता कि बेकार ही एक ऊँट इसे देने को कहा, कभी सोचता कि क्या हुआ, मेरे लिए उन्यासी ऊँट ही बहुत हैं। वह फकीर मेरे मन के द्वंद्व को समझ गया। उसने मुझे पाठ पढ़ाना चाहा और बोला, एक ऊँट को ले कर मैं क्या करूँगा, मैं तुम्हें इस शर्त पर वह जगह दिखाऊँगा कि तुम खजाने से भरे अपने ऊँटों में से आधे मुझे दे दो। अब तुम्हारी मरजी है। तुम खुद ही सोच लो कि चालीस ऊँट क्या तुम्हारे लिए कम हैं। मैंने विवशता में उसकी बात स्वीकार कर ली। मैंने यह भी सोचा कि चालीस ऊँटों का धन ही मेरी कई पीढ़ियों को काफी होगा।

हम दोनों एक अन्य दिशा में चले। एक पहाड़ में तंग दर्रे से निकल कर हम लोग पहाड़ों के बीच एक खुले स्थान में पहुँचे। वह जगह बिल्कुल सुनसान थी। फकीर ने कहा, ऊँटों को यहीं बिठा दो और मेरे साथ आओ। मैं ऊँटों को बिठा कर उसके साथ गया। कुछ दूर जा कर फकीर ने सूखी लकड़ियाँ जमा कर के चकमक पत्थर से आग निकाली और लकड़ियों को सुलगा दिया। आग जलने पर उसने अपनी झोली में से सुगंधित द्रव्य निकाल कर आग में डाला। उसमें से धुएँ का एक जबर्दस्त बादल उठा और एक ओर को चलने लगा। कुछ दूर जा कर वह फट गया और उसमें एक बड़ा टीला दिखाई दिया। जहाँ हम थे वहाँ से टीले तक एक रास्ता भी बन गया। हम दोनों उसके पास पहुँचे तो टीले में एक द्वार दिखाई दिया। द्वार से आगे बढ़ने पर एक बड़ी गुफा मिली जिसमें जिन्नों का बनाया हुआ एक भव्य भवन दिखाई दिया।

वह भवन इतना भव्य था कि मनुष्य उसे बना ही नहीं सकते। हम लोग उसके अंदर गए तो देखा कि उसमें असीम द्रव्य भरा हुआ था। अशर्फियों के एक ढेर को देख कर मैं उस पर ऐसे झपटा जैसा किसी शिकार पर शेर झपटे। मैंने ऊँटों की खुर्जियों में अशर्फियाँ भरना शुरू किया। फकीर भी द्रव्य संग्रह करने लगा किंतु वह केवल रत्नों को भरता। उसने मुझे भी अशर्फियों को छोड़ कर केवल रत्न उठाने को कहा मैं भी ऐसा करने लगा। हम लोगों ने सारी खुर्जियाँ बहुमूल्य रत्नों से भर ली। मैं बाहर जाने ही वाला था कि वह फकीर एक और कमरे में गया और मैं भी उसके साथ चला गया। उसमें भाँति-भाँति की स्वर्णनिर्मित वस्तुएँ रखी थीं। फकीर ने एक सोने का संदूकचा खोला और उसमें से एक लकड़ी की डिबिया निकाली और उसे खोल कर देखा। उसमें एक प्रकार का मरहम रखा हुआ था। उसने डिबिया बंद करके अपनी जेब में रख ली। फिर उसने आग जला कर उसमें सुगंध डाली और मंत्र पढ़ा जिससे वह महल गायब हो गया और वह गुफा और टीला भी गायब हो गया जो उसने मंत्र बल से पैदा किया था। हम लोग उसी मैदान में आ गए जिसमें मेरे ऊँट बँधे बैठे थे।

हम ने सारे ऊँटों को खुर्जियों से लादा और वादे के अनुसार आधे-आधे ऊँट बाँट कर फिर उस तंग दर्रे से निकले जहाँ से हो कर आए थे। बसरा और बगदाद के मार्ग पर पड़नेवाले मैदान में पहुँच कर मैं अपने चालीस ऊँट ले कर बगदाद की ओर चला और फकीर चालीस ऊँट ले कर बसरे की ओर रवाना हुआ। मैं कुछ ही कदम चला हूँगा कि शैतान ने मेरे मन में लोभ भर दिया और मैंने पीछे की ओर दौड़ कर फकीर को आवाज दी। वह रुका तो मैंने कहा, साईं जी आप तो भगवान के भक्त हैं, आप इतना धन ले कर क्या करेंगे। आपको तो इससे भगवान की आराधना में कठिनाई ही होगी। आप अगर बुरा न मानें तो मैं आपके हिस्से में से दस ऊँट ले लूँ। आप तो जानते ही है कि मेरे जैसे सांसारिक लोगों के लिए धन का ही महत्व होता है। फकीर इस पर मुस्कुराया और बोला, अच्छा, दस ऊँट और ले जाओ।

जब फकीर ने अपनी इच्छा से बगैर हीला-हुज्जत किए दस ऊँट मुझे दे डाले तो मुझे और लालच ने धर दबाया और मैंने सोचा कि इससे दस ऊँट और ले लूँ, इसे तो कोई अंतर पड़ना ही नहीं है। अतएव मैं उसके पास फिर गया और बोला, साईं जी, आप कहेंगे कि यह आदमी बार-बार परेशान कर रहा है। लेकिन मैं सोचता हँ कि आप जैसे संत महात्मा तीस ऊँटों को भी कैसे सँभालेंगे।

इससे आपकी साधना-आराधना में बहुत विघ्न पड़ेगा। इन में से दस ऊँट मुझे और दे दीजिए। फकीर ने फिर मुस्कुरा कर कहा, तुम ठीक कहते हो मेरे लिए बीस ऊँट काफी हैं। तुम दस ऊँट और ले लो।

दस ऊँट और ले कर मैं चला। किंतु मुझ पर लालच का भूत बुरी तरह सवार हो गया था। या यह समझो कि वह फकीर ही अपनी निगाहों और अपने व्यवहार से मेरे मन में लालच पैदा किए जा रहा था। मैंने अपने रास्ते से पलट कर पहले जैसी बातें कह कर और दस ऊँट उससे माँगे। उसने हँस कर यह बात भी स्वीकार कर ली और दस ऊँट अपने पास रख कर दस ऊँट मुझे दे दिए। किंतु मैं अभागा इतने से भी संतुष्ट न हुआ। मैंने बाकी दस ऊँटों का विचार अपने मन से निकालना चाहा किंतु मुझे उनका ध्यान बना रहा। मैं रास्ते से लौट कर एक बार फिर उस फकीर के पास गया और उसकी बड़ी मिन्नत-समाजत करके बाकी के ऊँट भी उससे माँगे। वह हँस कर बोला, भाई, तेरी तो नियत ही नहीं भरती। अच्छा यह बाकी दस ऊँट भी ले जा, भगवान तेरा भला करे।

सारे ऊँट पा कर भी मेरे मन का खोट न गया। मैंने उससे कहा, साईं जी आपने इतनी कृपा की है तो वह मरहम की डिबियाँ भी दे दीजिए जो आपने जिन्नों के महल से उठाई थी। उसने कहा कि मैं वह डिबिया नहीं दूँगा। अब मुझे उस का लालच हुआ। मैं फकीर से उसे देने के लिए हुज्जत करने लगा। मैंने मन में निश्चय कर लिय था कि यदि फकीर ने अपनी इच्छा से वह डिबिया नहीं दी तो मैं जबर्दस्ती करके उससे डिबिया ले लूँगा। मेने मन की बात को जान कर फकीर ने वह डिबिया भी मुझे दे दी और कहा, तुम डिबिया जरूर ले लो लेकिन यह जरूरी है कि तुम इस मरहम की विशेषता समझ लो। अगर तुम इसमें से थोड़ा सा मरहम अपनी बाईं आँख में लगाओगे तो तुम्हें सारे संसार के गुप्त कोश दिखाई देने लगेंगे। किंतु अगर तुमने इसे दाहिनी आँख में लगाया तो सदैव के लिए दोनों आँखों से अंधे हो जाओगे।

मैंने कहा, साईं जी, आप तो इस मरहम के पूरे जानकार हैं। आप ही इसे मेरी आँख में लगा दें। फकीर ने मेरी बाईं आँख बंद की और थोड़ा-सा मरहम ले कर पलक के ऊपर लगा दिया। मरहम लगते ही वैसा ही हुआ जैसा उस फकीर ने कहा था, यानी दुनिया भर के गुप्त और भूमिगत धन-कोश मुझे दिखाई देने लगे। मैं लालच में अंधा तो हो ही रहा था। मैंने सोचा कि अभी और कई खजाने होंगे जो नहीं दिखाई दे रहे हैं। मैंने दाहिनी आँख बंद की और फकीर से कहा कि इस पर भी मरहम लगा दो ताकि बाकी खजाने भी मुझे दिखने लगे। फकीर ने कहा, ऐसी बात न करो, अगर दाहिनी आँख में मरहम लगा तो तुम हमेशा के लिए अंधे हो जाओगे।

मेरी अक्ल पर परदा पड़ा हुआ था। मैंने सोचा कि यह फकीर मुझे धोखा दे रहा है। यह भी संभव है कि दाहिनी आँख मैं मरहम लग जाने से मुझे उस फकीर की शक्तियों के रहस्य मालूम हो जाए। मैं उसके पीछे पड़ गया। वह बार-बार कहता था कि यह मूर्खता भरी जिद छोड़ो और मरहम को दाईं आँख में लगवाने की बात न करो, किंतु मैं यही समझता कि वह स्वार्थवश ही मेरी दाईं आँख में मरहम नहीं लगा रहा है। मैं बराबर उससे कहता रहा कि दाहिनी आँख में मरहम लगा दो।

उसने मुझसे कहा, भाई, तू क्यों जिद कर रहा है। मैंने तेरा जितना लाभ कराया है क्या उतनी ही हानि मेरे हाथ से उठाना चाहता है। मैं एक बार भलाई करके अब तेरे साथ बुराई क्यों करूँ।

किंतु मैंने कहा, जैसे आपने अभी तक मेरी हर एक जिद पूरी की वैसे ही आखिरी जिद भी पूरी कर दीजिए। अगर इससे मेरी कोई हानि होगी तो मुझी पर उसकी जिम्मेदारी होगी, आप पर नहीं।

उसने कहा, अच्छा, तू अपनी बरबादी चाहता है तो वही सही। यह कह कर उसने मेरी दाहिनी आँख की पलक पर भी उस मरहम को लगा दिया। मरहम लगते ही मैं बिल्कुल अंधा हो गया। मुझे अपार दुख हुआ, मुझे अपनी मूर्खता याद न रही। मैंने फकीर को भला-बुरा कहना शुरू किया और कहा, अब यह सारा धन मेरे किस काम का? तुम मुझे अच्छा कर दो और अपने हिस्से के चालीस ऊँट ले कर चले जाओ। उसने कहा, अब कुछ नहीं हो सकता, मैंने तुम्हें पहले ही चेतावनी दी थी।

मैंने उससे और अनुनय-विनय की तो वह बोला, मैंने तो तुम्हारी भलाई का भरसक प्रयत्न किया था और तुम्हें हमेशा सत्परामर्श ही दिया था किंतु तुमने मेरी बातों को कपटपूर्ण समझा और गलत बातों के लिए जिद की। अब जो कुछ हो गया है वह मुझसे ठीक नहीं हो सकता, तुम्हारी दृष्टि कभी वापिस नहीं लौटेगी। मैंने उससे बहुत ही गिड़गिड़ा कर कहा, साईं जी, मुझे अब कोई लालच नहीं रहा। अब शौक से सारी धन संपदा और मेरे सभी अस्सी ऊँट ले जाइए, सिर्फ मेरी आँखों की ज्योति वापस दिला दीजिए। उसने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि सारे ऊँट और उन पर लदी हुई संपत्ति ले कर बसरा की ओर चल दिया। ऊँटों के चलने की आवाज सुन कर मैं चिल्लाया, साईंजी, इतनी कृपा तो कीजिए कि इस जंगल में इसी दशा में न छोड़िए। अपने साथ लिए चलिए। रास्ते में कोई व्यापारी बगदाद जाता हुआ मिलेगा तो मैं उसके साथ हो लूँगा। किंतु उसने मेरी बात न सुनी और चला गया। अब मैं अँधेरे में इधर-उधर भटकने लगा। मुझे मार्ग का भी ज्ञान न था कि पैदल ही चल देता। अंत में थक कर गिर रहा और भूख प्यास से मरणासन्न हो गया।

मेरे सौभाग्य से दूसरे ही दिन व्यापारियों का एक दल बसरा से बगदाद को जाते हुए उस मार्ग से निकला। वे लोग मेरी हालत पर तरस खा कर बगदाद ले आए। अब मेरे सामने इसके अलावा कोई रास्ता नहीं रहा कि मैं भीख माँग कर पेट पालूँ। मुझे अपने लालच और मूर्खता का इतना खेद हुआ कि मैंने कसम खा ली कि किसी से तब तक भीख नहीं लूँगा जब तक वह मेरे सिर पर एक धौल न मारे। इसीलिए कल मैंने आपसे धृष्टता की थी।

खलीफा ने कहा, तुम्हारी मूर्खता तो बहुत बड़ी थी। भगवान तुम्हें क्षमादान करेंगे। अब तुम जा कर अपनी सारी भिक्षुक मंडली को अपना वृत्तांत बताओ ताकि सभी को मालूम हो कि लालच का क्या फल होता है। अब तुम भीख माँगना छोड़ दो। मेरे खजाने से तुम्हें हर रोज पाँच रुपए मिला करेंगे और यह व्यवस्था तुम्हारे जीवन भर के लिए होगी। बाबा अब्दुल्ला ने जमीन से सिर लगा कर कहा, सरकार के आदेश का मैं खुशी से पालन करूँगा।

Alif Laila - 57 सीदी नोमान की कहानी - अलिफ लैला

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जखीरा, साहित्य संग्रह: Alif Laila - 56 अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी
Alif Laila - 56 अंधे बाबा अब्दुल्ला की कहानी
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