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दिल को भी हम राह पे लाते रहते है
खुद को भी कुछ-कुछ समझाते रहते है

चादर अपनी बढे, घटे ये फ़िक्र नहीं
पाँव हमेशा हम फैलाते रहते है

चुगने देते है चिडियों को खेत अपने
फिर यु ही बैठे पछताते रहते है

तपिश बदन की बढती है जब फुरकत में
नल के नीचे बैठ नहाते रहते है

रात भिगोते है दामन को अश्को से
सुबह धुप में उसे सुखाते रहते है

कही किसी की नज़र न हम को लग जाए
अपनी मौत की खबर उड़ाते रहते है - कुमार पाशी
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  1. great poetry of Kumar Pashi.... I love it .

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