कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं - कुमार विश्वास

कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं - कुमार विश्वास

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कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं मगर धरती कि बेचैनी को बस बादल समझता हैं मैं तुझसे दूर कैसा हू, तू मुझसे दूर कैसी हैं यह तेरा दिल समझता हैं या

कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं

कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता हैं
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी हैं
यह तेरा दिल समझता हैं या मेरा दिल समझता हैं

मोहब्बत इक एहसासों की पावन सी कहानी हैं
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दिवानी हैं
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आखो में आसू हैं
जो तू समझे तो मोती हैं जो न समझे तो पानी हैं

बदलने को तो इन आंखों के मंजर कम नहीं बदले,
तुम्हारी याद के मौसम हमारे गम नहीं बदले
तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी तब तो मानोगी,
जमाने और सदी की इस बदल में हम नहीं बदले

हमें मालूम है दो दिल जुदाई सह नहीं सकते
मगर रस्मे-वफ़ा ये है कि ये भी कह नहीं सकते
जरा कुछ देर तुम उन साहिलों कि चीख सुन भर लो
जो लहरों में तो डूबे हैं, मगर संग बह नहीं सकते

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !!
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !!

मिले हर जख्म को मुस्कान को सीना नहीं आया
अमरता चाहते थे पर ज़हर पीना नहीं आया
तुम्हारी और मेरी दास्ता में फर्क इतना है
मुझे मरना नहीं आया तुम्हे जीना नहीं आया

पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश में है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या

जहाँ हर दिन सिसकना है जहाँ हर रात गाना है
हमारी ज़िन्दगी भी इक तवायफ़ का घराना है
बहुत मजबूर होकर गीत रोटी के लिखे हमने
तुम्हारी याद का क्या है उसे तो रोज़ आना है

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ

मैं जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो साँचे टूट जाते हैं
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कँधा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक़्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं

सदा तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता
खुशी के घर में भी बोलों कभी क्या गम नहीं होता
फ़क़त इक आदमी के वास्तें जग छोड़ने वालो
फ़क़त उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता।

हमारे वास्ते कोई दुआ मांगे, असर तो हो
हकीकत में कहीं पर हो न हो आँखों में घर तो हो
तुम्हारे प्यार की बातें सुनाते हैं ज़माने को
तुम्हें खबरों में रखते हैं मगर तुमको खबर तो हो

बताऊँ क्या मुझे ऐसे सहारों ने सताया है,
नदी तो कुछ नहीं बोली किनारों ने सताया है
सदा ही शूल मेरी राह से खुद हट गये लेकिन,
मुझे तो हर घड़ी, हर पल बहारों ने सताया है।

हर एक नदिया के होंठों पे समंदर का तराना है,
यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है !
वही बातें पुरानी थीं, वही किस्सा पुराना है,
तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से जमाना है

मेरा प्रतिमान आंसू मे भिगो कर गढ़ लिया होता,
अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिया होता,
मेरी आँखों मे भी अंकित समर्पण की रिचाएँ थीं,
उन्हें कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता

कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ
किसी की इक तरनुम में, तराने भूल आया हूँ
मेरी अब राह मत तकना कभी ए आसमां वालो
मैं इक चिड़िया की आँखों में, उड़ाने भूल आया हूँ

हमें दो पल सुरूर-ए-इश्क़ में मदहोश रहने दो
ज़ेहन की सीढियाँ उतरो, अमां ये जोश रहने दो
तुम्ही कहते थे "ये मसले, नज़र सुलझी तो सुलझेंगे",
नज़र की बात है तो फिर ये लब खामोश रहने दो

मैं उसका हूँ वो इस अहसास से इनकार करता है
भरी महफ़िल में भी, रुसवा हर बार करता है
यकीं है सारी दुनिया को, खफा है मुझसे वो लेकिन
मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करता है

अभी चलता हूँ, रस्ते को मैं मंजिल मान लूँ कैसे
मसीहा दिल को अपनी जिद का कातिल मान लूँ कैसे
तुम्हारी याद के आदिम अंधेरे मुझ को घेरे हैं
तुम्हारे बिन जो बीते दिन उन्हें दिन मान लूँ कैसे

भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!!
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है, साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

क़लम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा
गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा
नही मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर
मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा

इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा
ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा
कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा
जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा

हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा
जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा
हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे
हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा

ये उर्दू बज़्म है और मैं तो हिंदी माँ का जाया हूँ
ज़बानें मुल्क़ की बहनें हैं ये पैग़ाम लाया हूँ
मुझे दुगनी मुहब्बत से सुनो उर्दू ज़बाँ वालों
मैं हिंदी माँ का बेटा हूँ, मैं घर मौसी के आया हूँ

स्वयं से दूर हो तुम भी, स्वयं से दूर हैं हम भी
बहुत मशहुर हो तुम भी, बहुत मशहुर हैं हम भी
बड़े मगरूर हो तुम भी, बड़े मगरूर हैं हम भी
अत: मजबूर हो तुम भी, अत: मजबूर हैं हम भी

हरेक टूटन, उदासी, ऊब आवारा ही होती है,
इसी आवारगी में प्यार की शुरुआत होती है,
मेरे हँसने को उसने भी गुनाहों में गिना जिसके,
हरेक आँसू को मैंने यूँ संभाला जैसे मोती है

कहीं पर जग लिए तुम बिन, कहीं पर सो लिए तुम बिन
भरी महफिल में भी अक्सर, अकेले हो लिए तुम बिन
ये पिछले चंद वर्षों की कमाई साथ है अपने
कभी तो हंस लिए तुम बिन, कभी तो रो लिए तुम बिन

हमें दिल में बसाकर अपने घर जाएं तो अच्छा हो
हमारी बात सुनलें और ठहर जाएं तो अच्छा हो
ये सारी शाम जब नज़रों ही नज़रो में बिता दी है
तो कुछ पल और आँखों में गुज़र जाएँ तो अच्छा हो

नज़र में शोखियाँ लब पर मुहब्बत का तराना है
मेरी उम्मीद की ज़द में अभी सारा ज़माना है
कई जीते है दिल के देश पर मालूम है मुझको
सिकंदर हूँ मुझे इक रोज़ खाली हाथ जाना है

हमारे शेर सुनकर भी जो वो खामोश इतना है
खुदा जाने गुरुर-ए-हुस्न में मदहोश कितना है
किसी प्याले ने पूछा है सुराही से सबब मय का
जो खुद बेहोश है वो क्या बताए होश कितना है

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल लुट गया रोता घिस घिस रीता तन चन्दन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज गजब की हैं,
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन
- कुमार विश्वास


koi deewana kahta hai, koi pagal samjhta hain

koi deewana kahta hai, koi pagal samjhta hain
magar dharti ki bechaini ko bas badal samjhta hain
mai tujhse door kaisa hun, tu mujhse door kaisi hain
yah tera dil samjhta hain ya mera dil samjhta hain

mohbbat ik ehsaso ki pawan si kahani hain
kabhi kabira deewana tha kabhi meera deewani hain
yahan sab log kahte hai meri aankho mein aansu hain
jo tu samjhe to moti hai jo n samjhe to pani hain

badlane ko to in aankho ke manzar kam nahin badle
tumhari yaad ke mausam hamare gham nahi badle

tum agale janm mein humse milogi tab to manogi
jamane aur sadi ki is badal mein ham nahin badle

hamen maloom hai do dil judaai se hai nahin sakte
magar rasme wafa yah hai ki yah bhi kah nahin sakte
jara kuchh der tum un sahilon ki chik sun bhar lo
laharon mein to dube hain magar sang baha nahin sakte

samander peer ka andar hai lekin ro nahin sakta
yah aansu pyar ka moti hai isko kho nahin sakta
meri chahat ko dulhan tu banaa lena magar sun le
jo mera ho nahin paya wo tera ho nahin sakta

mile har jakhm ko muskan ko sina nahin aaya
amrita chahate the per jahar pina nahin aaya
tumhari aur meri dastan mein fark itna hai
mujhe marna nahin aaya tumhen jina nahin aaya

panahon mein jo aaya ho to use per war karna kya
jo dil hara hua ho use per fir adhikar karna kya
mohabbat ka maja to dubne ki kashmkash mein hai
hokar maloom gahrai to dariya paar karna kya

jahan har din se chakna hai jahan har raat gana hai
hamari zindagi bhi ik tawayaf ka gharana hai
bahut majbur hokar geet roti ke likhe humne
tumhari yad ka kya hai use to roj aana hai

tumhare pass hun lekin jo duri hai samajhta hun
tumhare bin meri hasti adhuri hai samajhta hun
tumhen main bhul jaunga yah mumkin hai nahin lekin
tumhi ko bhul na sabse jaruri hai samajhta hun

main jab bhi tej chalta hun najare chhut jaate hain
koi jab roop karta hun to sanche tut jaate hain
main rota hun to aakar log kandha thapthapate hain
main hansta hun to aksar log mujhse ruth jaate hain

sada to dhup ke hathon mein hi parcham nahin hota
khushi ke ghar mein bhi bolo kabhi kya gam nahin hota
fakat ek aadami ke vaste jung chhodane walon
fakat use aadami se yah jamana kam nahin hota

hamare vaste koi dua mange asar to ho
hakikat mein kahin per ho na ho aankhon mein ghar to ho
tumhare pyar ki baten sunate hain jamane ko
tumhen khabron mein rakhte hain magar tumko khabar to ho

bataun kya mujhe aise saharon ne sataya hain
nadi to kuchh nahin boli kinaron ne sataya hai
sada hi shul meri rah se khud hat gaye lekin
mujhe to har ghadi har pal baharon ne sataya hai

har ek nadiya ke hothon per samander ka tarana hai
yahan per had ke aage sada koi bahana hai
wahi baten purani thi wahi kissa purana hai
tumhare aur mere bich mein fir se jamana hai

mera pratiman aansu mein bhigokar kar gadh liya hota
akinchan paav tab aage tumhara bad liya hota
meri aankhon mein bhi ankit samarpan ki richaen thi
unhen kuchh arth mil jata jo tumne padh liya hota

koi khamosh hai itna bahane bhul aaya hun
kisi ki ek tarun mein tarane bhul aaya hun
meri ab rahat mat takna kabhi ae aasman walon
mai chidiya ki aankhon mein udane bhool aaya hun

hamen do pal shurur-e-ishq mein madhosh rehne do
zehan ki sidhiyan utaro aman ye josh rahane do
tum hi kahate the yah masale najar suljhi to suljhenge
najar ki baat hai to fir ye lab khamosh rahane do

main uska hun wo is ehsas se inkar karta hai
bhari mahfil mein bhi rusva har bar karta hai
yakin hai sari duniya ko khafa hai mujhse vo lekin
mujhe maloom hai fir bhi mujhe se pyar karta hai

abhi chalta hun raste ko manjil maan lun kaise
masiha dil ko apni jid ka katil maan lun kaise
tumhari yad ki aadim andhere mujhko ghere hain
tumhare bin jo bite din unhen din man lun kaise

bhramar koi kumudini per machal baitha to hungama
hamare dil mein koi khwab pal baitha to hungama
abhi tak doob kar sunte the sab kissa mohabbat ka
main kisse kahkikat mein badal baitha to hungama

kabhi koi jo khulkar hans diya do pal to hungama
koi khwabon mein aakar bus liya do pal to hungama
main usse dur tha to shor tha sajish hai sajish hai
use bahon mein khulkar kas liya do pal to hungama

jab aata hai jivan mein khayalato ka hungama
yah jajbaton mulakat ho hasi raaton ka hungama
javani ke kayamat daur mein yah sochte hain sab
yah hungamon ki raten hain yah raaton ka hungama

kalam ko khoon mein khud ke dubota hun to hungama
gireba apna aansu mein bhi hota hun to hungama
nahin mujh per bhi jo khud ki khabar wo hai jamane par
main hansta hun to hungama mein rota hun to hungama

ibarat se gunaho tak ki manjil mein hai hungama
zara si pi ke aaye bas to mahfil mein hai hungama
kabhi bachpan javani aur budhape mein hai hungama
jahan mein hai kabhi to fir kabhi dil mein hai hungama

hue paida to dharti per hua abad hungama
javani ko hamari kar gaya barbad hungama
hamare bhaal per takdeer nahin hai likh diya jaise
hamare samne hain aur hamare bad hungama

yah urdu bus mein hai aur main to hindi man ka jaya hun
jabane mulk ki bahane hain paigam laya hun
mujhse dugni mohabbat se suno urdu jaban walon
mein hindi man ka beta hun main ghar mausi ke aaya hun

swayam se dur ho tum bhi swayam se dur hai ham bhi
bahut mashhur ho tum bhi bahut mashhur hai ham bhi
bade magrur ho tum bhi bade magrur hai ham bhi
atah majbur ho tum bhi atah majbur hain ham bhi

har ek tutan udaasi ub aawara hi hoti hai
isi aawargi mein pyar ki shuruaat hoti hai
mere hansne ko usne bhi gunahon mein gina jiske
har ek aansu ko maine u sambhala jaise moti hai

kahin per jag liye tum bin kahin par so liye tum bin
bhari mahfil mein bhi aksar akele ho liye tum bin
yah pichhle chandra varshon ki kamai sath hai apne
kabhi to hans liye tum bin kabhi to ro liye tum bin

hamen dil mein basa kar apne ghar jaaye to achcha ho
hamari baat sun le aur thahar jaaye to achcha ho
yah sari sham jab najron hi najron mein bita di hai
to kuchh pal aur aankhon mein gujar jaaye to achcha ho

nazar mein show kiya lab per mohabbat ka tarana hai
meri ummid ki jad me abhi sara jamana hai
kai jite hain dil ke desh per maloom hai mujhko
secunder hun mujhe ek roj khali hath jana hai

hamare sher sunkar bhi jo wo khamosh itna hai
khuda jaane gurur-e-husn mein madhosh kitna hai
kisi pyale mein poochha hai surahi se sabab may ka
jo khud behosh hai wo kya bataen hosh kitna hai

basti basti ghor udaasi parvat parvat khalipan
man hira bemol lut gaya rota ghis-ghis reeta tan chandan
is dharti se use ambar tak do hi chij gajab ki hai
ek to tera bholapan hai ek mera deewanapan
- Kumar Vishwas

COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. Thank you so much for providing... listened so many times, and every-time is like the first-time...

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  2. बहुत अच्छी कविता बहुत सुन्दर विचार है। आपके धन्यवाद



    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    ReplyDelete
कृपया स्पेम न करे |

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जखीरा, साहित्य संग्रह: कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं - कुमार विश्वास
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कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता हैं मगर धरती कि बेचैनी को बस बादल समझता हैं मैं तुझसे दूर कैसा हू, तू मुझसे दूर कैसी हैं यह तेरा दिल समझता हैं या
जखीरा, साहित्य संग्रह
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