
कुछ शेर - मुनव्वर राना
में उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है
लड़कपन में किए वादे कि कीमत कुछ नहीं होती
अंगूठी हाथ में रहती है मंगनी टूट जाती है
तो फिर जाकर कही माँ बाप को कुछ चैन पड़ता है
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है
उछलते खेलते बचपन में बेटा ढुढती होगी
तभी तो देखकर पोते को दादी मुस्कुराती है - मुनव्वर राना
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय
हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा प्रतिबिम्ब, “मनोज” पर, पढिए!