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होठो पर मोहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समंदर के किनारे नहीं आते

पलके भी चमक उठती है सोते में हमारी
आँखों में अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते

दिल उजड़ी हुई एक सारे कि तरह है
अब लोग यहाँ रात बिताने नहीं आते

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

क्या सोच के आए हो मोहब्बत कि गली में
जब नाज हसीनो के उठाने नहीं आते

अहबाब भी गैरो कि अदा सीख गए है
आते है मगर दिल को दुखाने नहीं आते
                                          -बशीर बद्र
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  1. बशीर साहब की गजले मुझे काफी पसंद है .....

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  2. बढ़िया ग़ज़ल है. धन्यवाद पढ़वाने के लिए.

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  3. बशीर बद्र साहब की शायरी के बारे में कुछ कहने लायक़ हो जाऊं तो कहूं
    फ़िलहाल तो यही कहूंगी कि आप का चयन लाजवाब है

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