hafeez-jalandhari

ईद का चाँद - हफीज़ जालंधरी

ईद का चाँद जीती रहो, मगर मुझे आता नहीं नज़र ? बेटी कहाँ है चाँद ? मुझे भी बता, किधर ? अफ़सोस, अब निगाह भी कमज़ोर हो गई नेमत खुदा ने दी थी बुढ़ापे में खो गई मीनारे-खानकाह के ऊपर ? कहाँ? कहाँ? कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं वहां कहाँ? हां, डालियो…

शेरों को आज़ादी है आज़ादी के पाबंद रहें - हफीज़ जालंधरी

शेरों को आज़ादी है आज़ादी के पाबंद रहें शेरों को आज़ादी है आज़ादी के पाबंद रहें जिसको चाहें चीरें फाड़ें खायें पियें आनंद रहें शाहीं को आज़ादी है आज़ादी से परवाज़ करे नन्ही मुन्नी चिडियों पर जब चाहे मश्क़े-नाज़ करे सांपों को आज़ादी है हर बस्त…

अभी तो मै जवान हूँ - हफ़ीज़ जालंधरी

अभी तो मै जवान हूँ अभी तो मै जवान हूँ ! हवा भी खुशगवार है गुलो पे भी निखार है तरन्नुम हजार है बहार पुरबहार है कहा चला है साक़िया इधर तो लौट इधर तो आ अरे ये देखता है क्या उठा सुबू, सुबू उठा सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर चमन क…

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