ईद का चाँद - हफीज़ जालंधरी
ईद का चाँद जीती रहो, मगर मुझे आता नहीं नज़र ? बेटी कहाँ है चाँद ? मुझे भी बता, किधर ? अफ़सोस, अब निगाह भी कमज़ोर हो गई नेमत खुदा ने दी थी बुढ़ापे में खो गई मीनारे-खानकाह के ऊपर ? कहाँ? कहाँ? कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं वहां कहाँ? हां, डालियो…