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majdoor ka ek din मजदूर का एक दिन - अनुराग शर्मा

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बाईं आँख रह-रह कर फड़क रही थी। कई बार मला मगर कोई फायदा न हुआ। उसे याद आया कि माँ बाईं आँख फड़कने को कितना बुरा मानती थी। छोटा था तो वह भी इ...

बाईं आँख रह-रह कर फड़क रही थी। कई बार मला मगर कोई फायदा न हुआ। उसे याद आया कि माँ बाईं आँख फड़कने को कितना बुरा मानती थी। छोटा था तो वह भी इस बात पर यकीन करता था। अब जानता है कि अमीरों को किसी भी आँख के फड़कने से कोई नुकसान नहीं होता और मुसीबत के मारों से तो भगवान राम भी अप्रसन्न ही रहते हैं। उन पर फटने के लिए दुर्भाग्य का बादल भला किसी आँख के फड़कने का इंतजार क्यों करेगा।

उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आज वह इतना उदास क्यों था? पहले भी कितनी बार ऐसा हुआ है जब बीमार बच्चे को घर छोड़कर काम पर निकला था। गरीब आदमी और कर भी क्या सकता है? मजदूरी नहीं करेगा तो क्या खुद खाएगा और क्या घर में खिलाएगा? बाबूजी ठीक ही तो कहते थे कि गरीब का दिल तो बेबसी का ठिकाना होता है। बाबूजी कितने जहीन थे। अगर किसी खाते-पीते घर में पैदा होते तो शायद पढ़-लिख कर बहुत बड़े आदमी बनते। वह भी जींस, टी-शर्ट पहनकर घूमते। स्कूल गए होते और शायद आज किसी आलीशान दफ्तर में बैठकर कोई अच्छी सी नौकरी कर रहे होते।

ऊपर से यह सर्दी का मौसम। कडाके की ठंड है। हाथ को हाथ नहीं सूझता। गाँव में तो आँगन में पुआल जलाकर थोड़ी देर बदन गर्म करने को मिल जाता था। शहर में अव्वल तो पुआल आए कहाँ से, और अगर कहीं से जुगाड़ हो भी गया तो चार फुट की कोठरी में खुद बैठें कि पुआल जलाएँ। आने वाली रात नए साल की पहली रात है। पैसेवालों की क्या बात है? हर तरफ जश्न मनाने की तैयारी होती दिख रही है।

बस में भी ठिठुरता रहा। एक ही तो सदरी थी, कितनी सर्दियाँ चलती। नामालूम, बस ही धीरे चल रही थी या फिर रास्ता आज कुछ ज्यादा लंबा हो गया था। बस वक्त गुजरता जा रहा था लेकिन उसके काम का ठिया तो आने का नाम ही न ले रहा था। अपनी सीट पर सिकुड़ा सा बैठा रहा। सारे रास्ते खैर मनाता रहा कि आज देर होने के बावजूद भी कोई न कोई काम मिल जाए। अगर खाली हाथ वापस आना पड़ा तो बहुत मुश्किल होगी। आज तो मुन्ने की दवा के लिए भी घर में एक कानी कौड़ी नहीं बची है।

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कंडक्टर को पास आता देखकर उसने अंटी में से सारी रेजगारी निकाल ली। कई बार गिना। टिकट के पैसे बिल्कुल बराबर, यह भी अजब इत्तफाक था। उसके हाथ के यह सिक्के ही उसके घर का संपूर्ण धन था। पत्नी का अंतिम गहना, उसकी पाजेब की जोड़ी, बेचने के बाद जितने भी पैसे मिले थे उसमें से अब बस यही सिक्के बचे थे। कंडक्टर ने एक हाथ में टिकट थमाया और उसने दूसरे हाथ से सिक्के उसकी हथेली में रख दिए। कंडक्टर ने सिक्के देखे, विद्रूप से मुँह बनाया और सिक्के शीशा-टूटी खिड़की से बाहर फेंकते हुए बोला, "अब तो भिखारी भी टिकट खरीदने लगे हैं।"

अपनी संपत्ति की आखिरी निशानी उन सिक्कों को इस बेकद्री से बस की खिड़की के बाहर कोहरे के सफेद समुद्र में खोते हुए देखकर उसका सर भन्ना गया। दिल में आया कि इस कंडक्टर को भी उसी खिड़की से बाहर फेंककर अपने सिक्के वापस मँगवाए मगर मुँह से उतना ही निकला, "बाहर काहे फेंक दिए जी?"

"तुझे टिकट मिल गया न? अब चुपचाप बैठा रह, अपना स्टाप आने तक।" कंडक्टर गुर्राकर अगली सवारी को टिकट पकड़ाने चल दिया।

वह सोचने लगा कि कब तक वह अकारण ही जानवरों की तरह दुत्कारा जाता रहेगा। यह कंडक्टर तो कोई सेठ नहीं है और न ही पढ़ा-लिखा बाबू है। यह तो शायद उसके जैसा ही है। अगर यह भी उसे इनसान नहीं समझ सकता तो फिर बड़े आदमियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

आखिरकार बस उसके ठिये तक पहुँच गई। वह बस से उतरकर सेठ की गद्दी की तरफ चलने लगा। कोहरे की बूँदें उसके कुरते पर मोतियों की तरह चिपकने लगी। पास में ही एक चाय के खोखे के आस-पास कुछ लोग खड़े अखबार पढ़ रहे थे। उसे पता था कि अंटी खाली है। फिर भी उसका हाथ वहाँ चला गया। कुछ क्षणों के लिए उसके कदम भी ठिठके मगर सच्चाई से समझौता करना तो अब उसकी आदत सी ही हो गई थी, सो गद्दी की तरफ चल पड़ा। मन ही मन मनाता जा रहा था कि कुछ न कुछ काम उसके लिए बच ही गया हो।

"लो आ गए अपने बाप की बरात में से!" सेठ का बेटा उसे देखकर साथ खड़े मुंशी से बोला। कल का लड़का, लेकिन कभी किसी मजदूर से सीधे मुँह बात नहीं करता है। फिर उसकी तरफ मुखातिब होकर बोला, "अबे ये आने का टाइम है क्या?"

"जी बाउजी, कोई काम है?" उसने सकुचाते हुए पूछा।

"किस्मत वाला है रे तू, हफ्ते भर का काम है तेरे लिए..." मुंशी ने आशा के विपरीत कहा, "ठेकेदार आता ही होगा बाहर, ट्रक में साथ में चला जइयो।"

ट्रक आने में ज्यादा देर नहीं लगी। ठेकेदार ने अंदर आकर सेठ के मुंशी के हाथ में कुछ रुपये पकड़ाए और मुंशी ने लगभग धकियाते हुए उसे आगे कर दिया।

"चल आजा फटाफट" ठेकेदार ने ड्राइवर के बगल में बैठते हुए कहा।

वह ट्रक के पीछे जाकर ऊपर चढ़ गया। कुछ मजदूर वहाँ पहले से ही मौजूद थे। कुदाली वगैरह औजार भी एक कोने में पड़े थे। ट्रक खुला था और ठंड भी थी। सूरज चढ़ने लगा था मगर धूप भी उसकी तरह ही बेदम थी।

उसने साथ बैठे आदमी को जय राम जी की कही और पूछा, "कहाँ जा रहे हैं?"

"जाने बालीगंज की तरफ है जाने कहाँ!" साथी ने कुछ अटपटा सा जवाब दिया।

साथ बैठे नौजवान मजदूर ने एक बीड़ी सुलगाकर उसकी तरफ बढ़ाई तो वह न नहीं कर सका। बीड़ी से शायद उसके शरीर और आवाज का कंपन कुछ कम हुआ। इस लड़के ने बताया कि वह बालीगंज के पास ही जा रहे हैं। काम करीब हफ्ते भर चलेगा। उसके चेहरे पर खुशी की एक लहर सी दौड़ गई। बालीगंज उसकी झुग्गी के एकदम पास था। उसने शुक्र मनाया कि शाम को वह जल्दी घर पहुँच सकेगा और पत्नी का हाथ भी बँटा सकेगा। कल से अगर वह घर से सीधा काम पर चला जाए तो रोज का बस का किराया भी बच जाएगा और बेमतलब ठंड में जमेगा भी नहीं।

उसने महसूस किया कि अब धूप में कुछ गरमी आने लगी थी। कोहरा भी छँट गया था। ट्रक बालीगंज में दाखिल हो चुका था। रास्ते जाने-पहचाने लग रहे थे। ला-बेला चौक, गांधी चौराहा, सब कुछ तो उसका रोज का देखा हुआ था।

ट्रक उजाड़ महल के मैदान में जाकर रुक गया। ट्रक के पास ही एक पुलिस की गाड़ी भी खड़ी थी। न जाने क्यों आज रास्ते में भी पुलिस की गाड़ियाँ खूब दिख रही थी। उजाड़ महल दरअसल कंक्रीट के एक ढाँचे का नाम था। चार-पाँच साल पहले किसी सेठ ने यहाँ अपनी कोठी बनवानी शुरू की थी। एक रात सात-आठ मजदूर एक अधबनी छत के गिरने से दबकर मर गए थे। तब से वह कोठी वैसी ही पड़ी थी। बाद में सेठ ने वह जमीन किसी को बेच दी थी। नए मालिक ने एकाध बार वहाँ काम शुरू कराना चाहा भी मगर हर बार कुछ न कुछ लफड़ा ही हुआ। एक बार पुलिस भी आई और उसके बाद वहाँ कोई काम नहीं हुआ।

कालांतर में उसके आसपास कई झुग्गी-झोपड़ियाँ उग आई थीं। वह भी ऐसी ही एक झुग्गी में रहता था। झुग्गी की बात याद आते ही उसे याद आया कि कल तो तौकीर भाई भी आएगा झुग्गी का किराया लेने। तौकीर भाई बहुत ही जालिम आदमी है। उससे पंगा लेकर कोई भी चैन से नहीं रह सकता। आम आदमी की तो बात ही क्या, इलाके में कोई नया थानेदार भी आता है तो पहले उसकी भट्टी पर ही आता है हाजिरी बजाने।

ठेकेदार ट्रक से नीचे उतरकर एक पुलिसवाले से बात करने लगा। दोनों एक-दूसरे को कुछ समझा रहे थे। थोड़ी देर बाद ठेकेदार ट्रक के पीछे आया और सभी मजदूरों को नीचे उतरकर एक तरफ खड़ा होने की हिदायत देकर फिर से उसी पुलिसवाले के पास चला गया। सोचने लगा कि वह दोपहर में ठेकेदार से पूछकर खाना खाने घर चला जाएगा, मुन्ना का हालचाल भी देख लेगा। घर के इतने पास काम करने का कुछ तो फायदा होना ही चाहिए।

"मेरे पीछे-पीछे आओ एक-एक कुदाल लेकर" ठेकेदार की बात से उसकी तंद्रा भंग हुई।

उसने भी एक कुदाल उठाई और बाकी मजदूरों के पीछे चलने लगा। यह क्या, ठेकेदार तो उसकी बस्ती की तरफ ही जा रहा था। उसने देखा कि पुलिस वाले कुछ ट्रकों में पुरानी साइकिलें, बर्तन, खटियाँ, और बहुत सा दूसरा सामान भर रहे थे। तमाम औरतें बच्चे जमा थे। बहुत शोर हो रहा था। एकाध छोटे झुंड पुलिस से उलझते हुए भी दिख रहे थे। वह जानना चाह रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? उसके मन में अजीब सी बेचैनी होने लगी थी।

ठेकेदार के आगे-आगे पुलिस का दीवान चल रहा था। दीवान उसकी बस्ती में घुस गया। वहाँ पहले से ही कई सिपाही मौजूद थे। दीवान ने उसके पड़ोसी नत्थू के घर की तरफ इशारा करके ठेकेदार से कहा, "यहाँ!"

"फटाफट लग जाओ काम पर..." ठेकेदार बोला।

उसे अभी तक सब कुछ एक रहस्य सा लग रहा था। उसने देखा कि नत्थू के घर का सारा सामान बाहर पड़ा था। लेकिन वहाँ पर कोई व्यक्ति नहीं था। नत्थू तो सवेरे ही फेरी लगाने निकल पड़ता है मगर उसकी घरवाली कहाँ है? नत्थू के घर से उड़कर जब उसकी नजर आगे बढ़ी तो अपने घर पर जाकर टिकी। वहाँ कुछ भीड़ सी लगी हुई थी। उसने देखा कि उसके घर का सामान भी बाहर पड़ा था। उसकी पत्नी मुन्ना को गोद में लिए हुए बाहर गली में खड़ी थी। नत्थू की घरवाली और कुछ और महिलाएँ भी वही थी।

तभी ठेकेदार के बाकी शब्द उसके कान में पड़े, "...ये पूरी लाइन आज शाम तक तोड़नी है, हफ्ते भर में यह पूरा कचरा साफ हो जाना चाहिए।"

अब बात उसकी समझ में आने लगी थी। हे भगवान! यह सारी कवायद उस जैसे गरीबों की झुग्गियाँ उजाड़ने के लिए है ताकि सेठ अपने महल बना सकें। नहीं, वह अपनी बस्ती नहीं टूटने देगा। अगर यह बस्ती टूट गई तो उसकी पत्नी कहाँ रहेगी, बीमार मुन्ना का क्या होगा? अपनी कुदाल फैंककर वह अपने घर की तरफ भागा।

"यह सब कैसे हुआ?" उसने पत्नी से पूछा। पत्नी बौराई सी उसे फटी आँखों से देखती रही। उस के मुँह से कोई बोल न फूटा। मुन्ना भी उसकी गोद में मूर्तिवत सा पड़ा रहा। शायद बहुत गहरी नींद में था।

नत्थू की घरवाली ने सुबकते हुए किसी तरह कहा, "तुम्हारे जाते ही खून की उल्टी हुई और एक घंटे में ही सब निबट गया। हमने तुरंत ही रज्जो के बाबूजी को भेजा तुम्हारा पता लगाने। बाप के बिना हम औरतें तो अंतिम संस्कार नहीं कर सकती हैं न।"

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जखीरा, साहित्य संग्रह | Jakhira, literature Collection: majdoor ka ek din मजदूर का एक दिन - अनुराग शर्मा
majdoor ka ek din मजदूर का एक दिन - अनुराग शर्मा
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