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दर्द की बस्तिया बसाके रखो
रहमतो को सजा-सजा के रखो

कागजो के घरो से दूर ज़रा
दिल की चिंगारिया दबा के रखो

आग के झिलमिलाते फूलो से
दिल का मौसम सजा-बना के रखो

आखिरी वक़्त मुस्कुराना है
यह हुनर है, बचा के रखो - बशीर बद्र
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  1. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई ।

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