इशरते कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जानादर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना
तुझसे किस्मत में मेरी सूरते-कुफ्ले-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
दिल हुआ कश्मकशे-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उक्दे का व़ा हो जाना
अब जफा से भी है महरूम हम अल्लाह-अल्लाह
इस कदर दुश्मने-अरबाबे-वफ़ा हो जाना
ज़ौफ़ से गिर्या मुब्दल ब-दमे-सर्द हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना
दिल से मिटना तेरी अंगुश्ते-हिनाई का ख्याल
हो गया गोश्त से नाख़ून का जुदा हो जाना
है मुझे अब्रे-बहारी का बरस कर खुलना
रोते-रोते गम-ए-फुरकत में फ़ना हो जाना
गर नहीं नकहत-ए-गुल को तेरे कुचे की हवस
क्यों है गर्द-ए-रह-ए-जौलान-ए-सबा हो जाना
ताकि मुझ पर खुले एजाज-ए-हवाए-सैकल
देख बरसात से सब्ज आईने का हो जाना
बख्शे है जलवा-ए-गुल जौक-ए-तमाशा 'ग़ालिब'
चश्म को चाहिए हर रंग में वा हो जाना - मिर्ज़ा ग़ालिब
मायने
इशरते-कतरा = बूंद की सफलता/सुख, सूरते-कुफ्ले-अबजद = अक्षरों से मिलकर बनाया गया शब्द जिससे ताला खुल जाता है, कश्मकशे-चारा-ए-ज़हमत = देख के उपचार की चेष्टा, उक्दा = गाठ, महरूम = वंचित, दुश्मने-अरबाबे-वफ़ा = वफादारो के ऐसे शत्रु जिन्हें अत्याचार के योग्य भी न समझा जाये, ज़ौफ़ = निर्बलता, गिरिया = रुदन, मुब्दल = परिणत, व-दमे-सर्द = ठंडी आह, बावर = विश्वास, अंगुश्ते-हिनाई = मेहंदी लगी उंगुली, अब्रे-बहारी = बसंत ऋतू का बादल, गमे-फुरकत = जुदाई का दुख, नकहते-गुल = पुष्प सौरभ, गर्दे-रहे-जौलाने-सबा = चमन की वायु के मार्ग की धुल, एजाजे-हवाए-सैकल = कलाई की वायु का रहस्य, जलवा-ए-गुल = फूलो का दृश्य, फ़ना = मौत/बर्बाद/निसार होना, जौके-तमाशा = मजाक/रसानुभाव, चश्म = आँख
ishrat-e-katra hai dariya me fana ho jana
ishrat-e-katra hai dariya me fana ho janadard ka had se gujrana hai dawa ho jana
tujhse kismat me meri surte-kufle-abjad
tha likha bat ke bante hi juda ho jana
dil hua kashmkash-e-chara-e-zahmat me tamam
mit gaya ghisne me is uqda ka waan ho jana
ab zafa se bhi hai mahroom ham allah-allah
is kadar dushman-e-arbab-e-wafa ho jana
zouf se giriya mubdal v-dam-sard hua
bawar aaya hame pani ka hawa ho jana
dil se mitna teri agusht-e-hinai ka khyal
ho gaya gosht se nakhun ka juda ho jana
hai mujhe abra-e-bahari ka baras kar khulna
rote-rote gam-e-furkat me fana ho jana
gar nahi nakhte-gul ko tere kuche ki hawas
kyo hai gard-e-rahe-joulane saba ho jana
taki mujh par khule ejaz-e-hawaye saikal
dekh barsat se sabj aaine ka ho jana
bakhshe hai jalwa-e-gul zouk-e-tamasha Ghalib
chashm ko chahiye har rang me waa ho jana - Mirza Ghalib