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अदम गोंडवी के जन्मदिवस / जयंती पर उनकी एक ग़ज़ल पेश है :

टी.वी. से अखबार तक गर सेक्स की बौछार हो
फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो

बह गए कितने सिकंदर वक्त के सैलाब में,
अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो

सभ्यता ने मौत से डरकर उठाये है कदम,
ताज की कारीगरी या चीन की दीवार हो

मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह
वो कोई मजलूम हो या साहिबे किरदार हो

एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हे
झोपडी से राजपथ का रास्ता हमवार हो - अदम गोंडवी

Roman

tv se akhbaar tak gar sex ki bouchhar ho
fir batao kaise apni soch ka vistaar ho

bah gaye kitne sikandar waqt ke sailab me
aqal is kachche ghade se kaise dariya paar ho

sabhyta ne mout se darkar uthaye hai kadam
taaj ki karigari ya chin ki deewar ho

meri khuddari ne apna sar jhukaya do jagah
wo koi majloom ho ya sahibe kirdar ho

ek sapna hai jise sakar karna hai tumhe
jhopdi se rajpath ka rasta hamwaar ho - Adam Gondvi

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  1. दिनांक 24/10/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

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    1. आपका बहुत बहुत आभार

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