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दीपावली और दीपो के पर्व पर कैफी आज़मी साहब की यह नज़्म पेश है :

एक दो भी नहीं छब्बीस दिए
एक एक करके जलाये मैंने

इक दिया नाम का आज़ादी के
उसने जलते हुए होठो से कहाँ
चाहे जिस मुल्क से गेहूं माँगो
हाथ फ़ैलाने की आज़ादी है
इस दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मेरा, ज़ेब मेरी खाली है

इक दिया नाम का यकजिहती के
रौशनी उस की जहाँ तक पहुंची
कौम को लड़ते झगडते देखा
माँ के आँचल में है जितने पैबंद
सब को एक साथ उधड़ते देखा

दूर से बीवी ने झल्ला के कहाँ
तेल महंगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिए इतने जला रखे है
अपने घर में झरोखा न मुंडेर
ताव सपनो के सजा रखे है

आया गुस्से का इक झोंका
बुझ गए सारे दिए
हाँ मगर एक दिया,
नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है - कैफी आज़मी

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Roman

ek do nahi chhabbis diye
ek ek karke jalaye maine

ik diya naam ka aazadi ke
usne jalte hue hothi se kaha
chahe jis mulk se gehu maango
haath failane ki aazadi hai

is diya naam ka khushhali ke
us ke jalte hi yah maloom hua
kitni badhali hai
pet khali hai mera, jeb meri khali hai

ik diya naam ka yakjihti ke
roushni us ki jahaan tak pahuchi
koum ko ladte jhagdate dekha
maan ke aanchal me hai jitne paiband
sab ko ek sath udhdte dekha

door se bivi ne jhalla ke kahan
tel mahnga bhi hai, milta bhi nahi
kyo diye itne jala rakhe hai
apne ghar me jharokha n munder
taav sapno ke saja rakhe hai

aaya gusse ka ek aisa jhouka
bujh gaye sare diye
haan magar ek diya
naam hai jiska ummid
jhilmilata hi chala jata hai - Kaifi Aazmi

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  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कार्तिक पूर्णिमा ~ देव दीपावली और गुरु पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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