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सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल
तू ने अपने तरकश में जो रक्खा है वो तीर निकाल

जिस का कुछ अंजाम नहीं वो जंग है दो नक़्क़ादों की
लफ़्ज़ों की सफ़्फ़ाक सिनानें लहजों की शमशीर निकाल

आशोब-ए-तख़रीब सा कुछ इस अंदाम-ए-तख़्लीक़ में है
तोड़ मिरे दीवार-ओ-दर को एक नई ता'मीर निकाल

चाँद सितारों की खेती कर रात की बंजर धरती पर
आँख के इस सूखे दरिया से ख़्वाबों की ताबीर निकाल

तेरे इस एहसान से मेरी ग़ैरत का दम घुटता है
मेरे इन पैरों से अपनी शोहरत की ज़ंजीर निकाल

रोज़ की आपा-धापी से कुछ वक़्त चुरा कर लाए हैं
यार ज़रा हम दोनों की इक अच्छी सी तस्वीर निकाल

'शाहिद' अब ये आलम है इस अहद-ए-सुख़न-अर्ज़ानी का
'मीर' पे कर ईराद भी उस पे 'ग़ालिब' की तफ़्सीर निकाल - शाहीद कमाल

Roman

soch raha hai itna kyu ae dast-e--be-takhir nikal
tu ne apne tarkah me jo rakkha hai wo teer nikal

jis ka kuch anzam nahi wo jang hai do nakkado ki
lafzo ki saffaq sinane lahzo ki shamsheer nikal

aashob-e-takhreeb sa kuch is andam-e-takhlik me hai
tod mire deewar-o-dar ko nai tameer nikal

chand sitaro ki kheti kar raat ki banzar dharti par
aankh ke is sukhe dariya se khwabo ki tabeer nikal

tere is ehsan se meri gairat ka dam ghutta hai
mere in pairo se apni shohrat ki zanzeer nikal

roz ki aapa-dhapi se kuch waqtr chura kar laye hai
yaar zara ham doni ki ek achchi si tasweer nikal

"Shahid" ab ye aalam hai is ahad-e-sukhan-arjani ka
"Meer" pe kar iraad bhi us pe "Ghalib" ki tafseel nikal - Shahid Kamal

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  1. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में आज गुरूवार 28 -09 -2017 को प्रकाशनार्थ 804 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

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    1. धन्यवाद आभार आपका

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  2. बहुत ही बेहतरीन सोच ।

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  3. बहुत ही उम्दा विचार आभार ,"एकलव्य"

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