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सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी,
बे-पंख उड़ाने लेती है, जो अपने ही आँचल जैसी !

लाया है बना कर उसको दुल्हन, ये जोबन, ये अलबेलापन,
इस उम्र में सर से पाव तक लगती है ताजमहल जैसी !

चहरे पे सजे आईने है, या दो बेदाग नगीने है,
किस झील से आई है धुल कर ये आँखे नीलकमल जैसी !

जो देखे उसे वह खो जाये, खो जाये तो शायर हो जाये,
उसका अंदाज है गीतों-सा, उसकी आवाज गज़ल जैसी !

वह ऐसे कतील अब याद आये, सपना जैसे कोई दुहराए,
मै आज भी उसको चाहता हू, पर बात कहाँ वह कल कैसी !- कतील शिफाई

Roman

Sawan ke suhane mousam me ik naar mili badal jaisi
be-pankh udane leti hai, jo apne hi aanchal jaisi

laya hai bana kar usko dulhan, ye joban, ye albelapan
is umra me sar se paanv tak lagti hai tajmahal jaisi

chehre se saje aaine hai, ya do bedag nageene hai
kis jheel se aai hai dhool kar ye aankhe neelkamal jaisi

jo dekhe use wah kho jaye, kho jaye to shayar ho jaye
uska andaaj hai geeto-sa, uski aawaj hai ghazal jaisi

wah aise qateel ab aayd aaye, sapna jaise koi tuhraye
mai aaj bhi usko chahta hu, par baat kaha wah kal jaisi - Qateel Jaisi

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  1. ग़ज़ल दिल को छू गई।
    बेहद पसंद आई।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!

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  2. बहुत अच्छी रचना...बधाई.
    ___________________
    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

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