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शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो
मै कब का जा चुका हु, सदाए मुझे न दो

जो जहर पी चुका हु तुम्ही ने मुझे दिया
अब तुम तो जिन्दगी कि दुआए मुझे न दो

यह भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
ऐ खुसर्वाने-शहर, कबाए मुझे न दो

ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकू
हर बार दूर जा के सदाए मुझे न दो

कब मुझको ऐतराफे-मुह्हबत न था फ़राज़
कब मैंने यह कहा था, सजाए मुझे न दो- अहमद फ़राज़
मायने
सदा- आवाज, खुसर्वाने-शहर=नगर शासक, काबाए-सम्मानित लिबास, ऐतराफे-मुह्हबत=प्रेम कि स्वीकारोक्ति

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  1. कब मुझको ऐतराफे-मुह्हबत न था फ़राज़
    कब मैंने यह कहा था, सजाए मुझे न दो !

    सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  2. nice poem..

    visit:- http://rhymesandverses.blogspot.com/

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