विडम्बना - ज़ाहिर अली सिद्दीकी

विडम्बना

बादल देख प्रसन्न हो जाता
खुशी के आँसू बहाता है
बिन बारिश भी फसल उगाये
कर्ज़ तले दब जाता है।

खुश हो जाता अन्न उगाकर
भूखा वही सो जाता है
चिंता में फँसकर अक्सर
मौत के मुँह चढ़ जाता है।

खुशी-खुशी जो औरों का
रहने का ठिकाना बनाता है
बाढ़ में मैंने देखा अक्सर
घर उसका बह जाता है।

सीख दिया चलना जिसने
सबक सिखाया जाता है
अपनों के ही बस्ती में
ग़ैर वही हो जाता है।

कोख़ में पाला है जिसने
उसे प्यार बताया जाता है
नफ़रत से अंदर का दीपक
अक्सर बुझाया जाता है।

स्वर्ग-नरक के चक्कर मे
दुनिया का चक्कर काटता है
क़दमों तले जिसके ज़न्नत
विडम्बना दूर हो जाता है। - ज़ाहिर अली सिद्दीकी


परिचय-ज़हीर अली सिद्दीक़ी
ई-मेल - chem.siddiqui2013@gmail.com
स्थायी पता: ग्राम-जोगीबारी, पो.खुरहुरिया, जनपद-सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश-२७२२०४
शिक्षा-स्तनातक एवं परास्नातक -किरोड़ीमल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय
रचनाएं- पुरवाई, सेतु, लेखनी, साहित्यकुञ्ज, साहित्यसुधा, सहित्यनामा, साहित्यमंजरी, साहित्य रचना,स्वर्गविभा, अनहद कृति, हमरंग, जय विजय, हस्ताक्षर, रचनाकार, पञ्चदूत, आंच, मातृ भाषा.कॉम आदि पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
सम्प्रति- पी-एच.डी.(शोधरत) आय. सी.टी. मुम्बई,महाराष्ट्र।

Vidambana

badal dekh prasann ho jata
khushi ke aansu bahata hai
bin barish bhi fasal ugaye
karz tale dab jata hai

khush ho jata ann ugakar
bhukha wahi so jata hai
chinta me faskar aksar
mout ke munh chadh jata hai

khushi khushi jo auro ka
rahne ka thikana banata hai
badh me maine dekha aksar
ghar uska bah jata hai

seekh diya challna jisne
sabak sikhaya jata hai
apno ke hi basti me
gair wahi ho jata hai

kokh me pala hai jisne
ue pyar bataya jata hai
nafrat se andar ka deepak
aksar bujhaya jata hai

swarg-narak ke chakkar me
duniya ka chakkar katta hai
kadmo tale jiske jannat
vidambana door ho jata hai - Zahir Ali Siddiqui
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