है ज़िंदगी को कैसी जलन हाय इन दिनों - अचल दीप दुबे

है ज़िंदगी को कैसी जलन हाय इन दिनों

है ज़िंदगी को कैसी जलन हाय इन दिनों
है मौत के माथे पे शिकन हाय इन दिनों

शायद मेरे ज़मीर को फ़ुर्सत न आई रास
रहती है बेवजह सी थकन हाय इन दिनों

रंगत रही न शोख़ियाँ, ना ख़ुशबु ना ख़ुलूस
वीरान है हर एक अंजुमन हाय इन दिनों

या मौला इस अज़ाब ने बरपाया क्या कहर
होने लगी किल्लत-ए-कफ़न हाय इन दिनों

ताज्जुब है कि इसको कोई भी टोकता नहीं
घूमे है झूठ बे-पैरहन हाय इन दिनों

चेहरों की जगह झूठ ही मंज़ूर था हमें
सब ने लिया है नकाब पहन हाय इन दिनों

ना मिलाओ हाथ किसे से, न गले मिलो ‘अचल’
मिलने का ये नया है चलन हाय इन दिनों - अचल दीप दुबे


hai zindagi ko kaisi jalan haay in dino

hai zindagi ko kaisi jalan haay in dino
hai mout ke maathe pe shikan haay in dino

shayad mere zameer ko fursat n aai raas
rahti hai bewajah si thakan haay in dino

rangat rahi n shokhiyaN, n khushbu n khulus
veeran hai har ek anjuman haay in dino

ya moula is ajab ne barpaya kya kahar
hone lagi killat-e-kafan haay in dino

tajjub hai ki isko koi bhi tokta nahi
ghume hai jhuth be-pairahan haay in dino

chehro ki jagah jhuth hi manjur tha hame
sab ne liya hai naqab pahan haay in dino

na milao haath kisse, n gale milo "Achal"
milne ka ye naya hai chalan haay in dino - Achal Deep Dubey

शायर परिचय:
अचल दीप को हिंदी साहित्य, खास कर के ग़ज़लों में रूचि अपने पुरे छायाकार एवं थोड़े शायर पिता से विरासत में मिली है । पेशे से आप अन्ग्रेजी के अध्यापक है एवं लगभग पिछले अठारह वर्षो से अंग्रेजी अध्यापन कर रहे है ।

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