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दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुग़ालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई - गुलज़ार

Roman
din kuch aise gujarata hai koi
jaise ehsan utarata hai koi

aaina dekh ke taslli hui
ham ko is ghar me janta hai koi

pak gaya hai shazar pe phal shayad
phir se patthar uchhalata hai koi

phir nazar me lahu ke chhite hai
tum ko shayada mugalata hai koi

der se gunjte hai sannate
jaise ham ko pukarata hai koi - Gulzar
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  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 21/04/2019 की बुलेटिन, " जोकर, मुखौटा और लोग - ब्लॉग बुलेटिन“ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुन्दर

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