मीना कुमारी जी को अपनी फ़िल्मी अदाकारी के लिए जाना जाता है पर अपने जीवन में देखे गए दर्दो ने आपको एक शायरा बना दिया, आप शायरी नाज़ तखल्लुस से करती थी | आपकी शायरी के संकलन को गुलज़ार साहब ने प्रकाशित करवाया |
मैं जो रास्ते पे चल पड़ी
मैं जो रास्ते पे चल पड़ीमुझे मंदिरों ने दी निदा
मुझे मस्जिदों ने दी सज़ा
मैं जो रास्ते पे चल पड़ी
मेरी साँस भी रुकती नहीं
मेरे पाँव भी थमते नहीं
मेरी आह भी गिरती नहीं
मेरे हाथ जो बढते नहीं
कि मैं रास्ते पे चल पड़ी
यह जो ज़ख़्म कि भरते नहीं
यही ग़म हैं जो मरते नहीं
इनसे मिली मुझको क़ज़ा
मुझे साहिलों ने दी सज़ा
कि मैं रास्ते पे चल पड़ी
सभी की आँखें सुर्ख़ हैं
सभी के चेहरे ज़र्द हैं
क्यों नक्शे पा आएं नज़र
यह तो रास्ते की ग़र्द हैं
मेरा दर्द कुछ ऐसे बहा
मेरा दम ही कुछ ऐसे रुका
मैं कि रास्ते पे चल पड़ी
- मीना कुमारी नाज़
mai jo raste pe chal padi
mai jo raste pe chal padimujhe mandiro ne di nida
mujhe masjido ne di saja
mai jo raste pe chal padi
meri saans bhi rukti nahi
mere paanv bhi thakte nahi
meri aah bhi girti nahi
mere haath jo badhte nahi
ki mai jo raste pe chal padi
yah zakhm ki bharte nahi
yahi gham hai jo marte nahi
inse mili mujhko qaza
mujhe sahilo ne di saja
ki mai raste pe chal padi
sabhi ki aankhe surkh hai
sabhi ke chahre zard hai
kyo naqshe paa aaye nazar
yah to raste ki gard hai
mera dard kuch aise baha
mere dam hi kuch aise ruka
mai ki raste pe chal padi
- Meena Kumari Naaz