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दरिया ने जब से चुप का लिबादा पहन लिया
प्यासों ने अपने जिस्म पे सेहरा पहन लिया

वो टाट की कबा थी या कागज था जो भी था
जैसा भी मिल गया हमें वैसा पहन लिया

फाको से तंग आये तो पोशाक बेच दी
उरिया हुए तो शब् का लिबादा पहन लिया

गर्मी लगी तो खुद से अलग हों के सो गए
सर्दी लगी तो खुद को दोबारा पहन लिया

भुचाल में कफ़न की ज़रूरत नहीं पड़ी
हर लाश ने मकान का मलबा पहन लिया

बेदिल लिबास-ए-जीस्त बहुत दीदाजेब था
और हम ने इस लिबास को उल्टा पहन लिया- बेदिल हैदरी / Bedil Haidri
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