शायरे फितरत हूँ मै, जब फिक्र फरमाता हूँ मै - जिगर मुरादाबादी

शायरे फितरत हूँ मै, जब फिक्र फरमाता हूँ मै
रूह बन कर जर्रे-जर्रे में समां जाता हूँ मै

आ की तुझ बिन इस तरह से दोस्त घबराता हूँ मै
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मै

जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं
और भी बेग़ाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं

जब मकान-ओ-लामकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं
अल्लाह-अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं

हाय रे मजबुरिया, तर्के मुहब्बत के लिए
मुझको समझते है वो और उनको समझाता हूँ मै

मेरी हिम्मत देखना, मेरी तबियत देखना
जो सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूँ मै

हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है
अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं

तेरी महफ़िल, तेरे जलवे, फिर तकाजा क्या जरुर
ले उठा जाता हूँ जालिम, ले चला जाता हूँ मै

वाह रे शौके शहादत, कुए कातिल की तरफ
गुनगुनाता, रक्स करता, झूमता जाता हूँ मै

देखना उस इश्क़ की ये तुर्फ़ाकारी देखना
वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शर्माता हूँ मैं

एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिसे "ज़िगर"
एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं - जिगर मुरादाबादी
मायने
शायरे फितरत=प्रकृति का शायर, फिक्र-चिंतन, जर्रे-जर्रे=कण-कण, शय=चीज़, तर्के मुहब्बत=मुहब्बत छोड़ना, शौके शहादत=शहादत की इच्छा, कुए कांतिल=कांतिल अर्थात प्रियतम की गली, रक्स=नृत्य

Post a Comment

कृपया स्पेम न करे |

Previous Post Next Post

Advertisement

preload preload preload preload preload