
थी अपनी हद में धुल, अभी कल की बात है
थी अपनी हद में धुल, अभी कल की बात हैराहों के थे उसूल, अभी कल की बात है
काफी थी एक ठेस बिखरने के वास्ते
इंसान भी थे फुल, अभी कल की बात है
उम्रो का वो लिहाज़ की बरगद की राह में
आते न थे बाबुल, अभी कल की बात है
दोनों ही एक ड़ाल के पंछी की तरह थे
ये राम वो रसूल, अभी कल की बात है
आती थी बात जब भी वतन के बकार की
क़ुरबानी थी क़ुबूल, अभी कल की बात है
अपनी तो खैर गिनती दीवानों ही में रही
करते थे तुम भी भूल, अभी कल की बात है - हस्तीमल हस्ती
thi apni had me dhul, abhi kal ki baat hai
thi apni had me dhul, abhi kal ki baat hairaho ke the usul, abhi kal ki baat hai
kaafi thi ek thes bikhrne ke waste
insaan bhi the phul, abhi kal ki baat hai
umro ka wo lihaaj ki bargad ki raah me
aate n the babool, abhi kal ki baat hai
dono hi ek daal ke panchhi ki tarah the
wo ram wo rasul, abhi kal ki baat hai
aati thi baat jab bhi watan ke bakaar ki
kurbani thi kabool, abhi kal ki baat hai
apni to khair ginti deewano hi me rahi
karte the tum bhi bhool, abhi kal ki baat hai - Hastimal Hasti
उम्रों का वो लिहाज़ की बरगद की राह में
आते न थे बबूल अभी कल की बात है
अपनी तो खैर गिनती दीवानों ही में रही
करते थे तुम भी भूल अभी कल की बात है
हस्ती मल जी को पढना उनसे मिलना और उन्हें सुनना हर बार एक नए अनुभव से गुजरने के समान है...हस्ती जी की शायरी दिल की गहराइयों से निकलती शायरी है...उनकी इस ग़ज़ल के किस शेर की तारीफ़ करूँ और किसे छोडूं...मकते से मतले तक का सफ़र बेहद हसीं हैं...शुक्रिया आपका उन्हें पढवाने के लिए.
नीरज