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मुझे ग़ुस्सा दिखाया जा रहा है
तबस्सुम को चबाया जा रहा है

वहीं तक आबरू में ज़ब्त-ए-ग़म है
जहाँ तक मुस्कुराया जा रहा है

दो आलम मैंने छोड़े जिसकी ख़ातिर
वही दामन छुड़ाया जा रहा है

क़रीब आने में है उनको तक़ल्लुफ़
वहीं से मुस्कुराया जा रहा है-शेरी भोपाली

मायने
तबस्सुम - मुस्कराहट, आबरू - इज़्ज़त, ज़ब्त-ए-ग़म - दुःख प्रकट ना होने देना, आलम - दुनिया, तक़ल्लुफ़ - लिहाज

Roman

Mujhe gussa dikhaaya jaa raha hai
Tabassum ko chabaaya jaa raha hai

Wahin tak aabroo me zabt-e-gham hai
Jahan tak mushkuraaya jaa raha hai

Do aalam maine chhode jiski khaatir
Wahi daaman chhudaaya jaa raha hai

Kareeb aane mein hai unko takalluf
Wahin se muskuraaya jaa raha hai -Sheri Bhopali

इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनते है

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