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पत्थर सुलग रहे थे कोई नक़्शे-पा न था
हम जिस तरफ चले थे, उधर रास्ता न था

परछाईयो के शहर में तन्हाईयां न पूछ
अपना शरीके-गम कोई अपने सिवा न था

यु देखती है गुमशुदा लम्हों के मोड से
इस जिंदगी से जैसे कोई वास्ता न था

चेहरों पे जम गई थी खयालो की उलझने
लफ्जो की जुस्तजू में कोई बोलता न था

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गयी
जंगल में दूर-दूर हवा का पता न था

'राशिद' किसे सुनाते गली में तिरी ग़ज़ल
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था - मुमताज़ राशिद

मायने
नक़्शे-पा=पैर का निशान, शरीके-गम=दुख में सम्मिलित, जुस्तजू=खोज, सदा=आवाज, दरीचा=खिडकी

Roman
paththar sulag rahe the koi nakshe-paa n tha
ham jis taraf chale the, udhar rasta n tha

parchhaiyo ke shahar me tanhaiya n puch
apna sharike-gam koi apne siwa n tha

yu dekhti hai gumshuda lamho ke mod se
is jindgi se jaise koi wasta n tha

chehre pe jam gayi thi khyalo ki uljhane
lafzo ki justju me koi bolta n tha

patto ke tutne ki sadaa ghut ke rah gayi
jangal me door-door hawa ka pata n tha

'Rashid' kise sunaate gali me teri ghazal
uske makaan ka koi daricha khula n tha- Mumtaz Rashid
#jakhira

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  1. purshottam abbi "azer"December 7, 2012 at 9:51 PM

    बहुत उम्दा ग़ज़ल मुबारकबाद
    क्या-क्या कहे हैं शेर ये राशिद कमाल के
    गैरों में दाद देने का बस हौंसला न था

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