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दरिया ने जब से चुप का लिबादा पहन लिया
प्यासों ने अपने जिस्म पे सेहरा पहन लिया

वो टाट की कबा थी या कागज था जो भी था
जैसा भी मिल गया हमें वैसा पहन लिया

फाको से तंग आये तो पोशाक बेच दी
उरिया हुए तो शब् का लिबादा पहन लिया

गर्मी लगी तो खुद से अलग हों के सो गए
सर्दी लगी तो खुद को दोबारा पहन लिया

भुचाल में कफ़न की ज़रूरत नहीं पड़ी
हर लाश ने मकान का मलबा पहन लिया

बेदिल लिबास-ए-जीस्त बहुत दीदाजेब था
और हम ने इस लिबास को उल्टा पहन लिया- बेदिल हैदरी / Bedil Haidri

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  1. वाह बहुत ही सुन्दर और गहन रचना।
    विघ्नहर्ता विघ्न हरो
    मेटो सकल क्लेश
    जन जन जीवन मे करो
    ज्योति बन प्रवेश
    ज्योति बन प्रवेश
    करो बुद्धि जागृत
    सबके साथ हिलमिल रहें
    देश दुनिया के नागरिक

    श्री गणेशाय नम:……गणेश जी का आगमन हर घर मे शुभ हो।

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