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रोज बढ़ता हू जहा से आगे
फिर वही लौट के आ जाता हू

बारहा तोड़ चुका हू जिनको
उन्ही दीवारों से टकराता हू

रोज बसते है कई शहर नए
रोज धरती में समां जाते है

जलजलो में थी जरा सी गर्मी
वो भी अब रोज ही आ जाते है

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कही धुप न साया न सराब

कितने अरमान है किस सहरा में
कौन रखता है मजारो का हिसाब- कैफी आज़मी

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