1
मौज ए गम गुल क़तर गई होगी
नदी चढ़ कर उतर गई होगी

गर्क होना था जिस को वो किश्ती
साहिलों से गुज़र गई होगी

हम ज़मी वालो की जो पहले पहल
आसमाँ पर नज़र गई होगी

आईनाखाने मै बा हर सूरत
आब ओ ताब ए गुहर गई होगी

हादसों आफतों मसाइब से
जिंदगी क्या जो डर गई होगी

उस सफ़र मै खलाओं के ता दूर
हसरत ए बाल ओ पर गई होगी

ए जिया बात अकल ओ दानिश की
दिल का नुकसान कर गई होगी- मेहर लाल ज़िया फतेहाबादी

Contributed by Ravinder Soni (रविंदर सोनी)

Post a Comment Blogger

  1. बहुत उम्दा गज़ल पेश की है ..बहुत खूब

    ReplyDelete

 
Top