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अजनबी दुनिया में तेरा आशना मैं ही तो था
दी सज़ा तू ने जिसे वो बेख़ता मैं ही तो था

मैं जो टूटा हो गया हंगामा ए महशर बपा
तार ए साज़ ए बेसदा ओ बेनवा मैं ही तो था

नाख़ुदा ओ मौज ए तूफ़ान की शिकायत क्या करूं
जिस ने ख़ुद किश्ती डुबो दी ऐ ख़ुदा मैं ही तो था

उस को बाहर ला के रुसवा कर दिया बाज़ार में
जो मुझे अन्दर से देता था सदा मैं ही तो था

ता अबद करना पडेगा सुबह ए नौ का इन्तिज़ार
मुन्तज़िर रोज़ ए अज़ल से शाम का मैं ही तो था

हो गया मसरूर बुत अपनी अना को तोड़ कर
दरमियान ए मा ओ तो इक फ़ासला मैं ही तो था

था 'ज़िया' अहसास ए तन्हाई भरी महफ़िल में भी
मुझ से रह कर भी जुदा जो था मेरा मैं ही तो था -मेहर लाल ज़िया फतेहाबादी
Contributed by Ravinder Soni (रविंदर सोनी)

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