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क्या बताऊ कैसा खुद को दर-ब-दर मैंने किया
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया

तू तो नफरत भी न कर पायेगा इस शिद्दत के साथ
जिस बला का प्यार तुझसे बेखबर मैंने किया

कैसे बच्चो को बताऊ रास्तो के पेचो-ख़म
जिन्दगी भर तो किताबो का सफ़र मैंने किया

शोहरतो कि नज्र कर दी शेर की मासूमियत
उस दिये की रौशनी को दर-ब-दर मैंने किया

चाँद जज्बाती से रिश्ते को बचाने को वसीम
कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया
                                               - वसीम बरेलवी
मायने
शिद्दत=अति, पेचो-ख़म=घुमाव-फिराव, नज्र=भेट, उपहार, जब्र=जोर जबरदस्ती
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  1. लाजवाब ग़ज़ल है भाई वसीम साहब की ....

    शुक्रिया इस हम तक पहुंचाने का !

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