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ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं,
और क्या ज़ुर्म है पता ही नहीं.

इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं.

सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे,
झूठ की कोई इन्तेहा ही नहीं.

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं
                                -कृष्ण बिहारी नूर


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  1. मेरे प्रिय शायर की गज़ल पर क्या कहूँ...निशब्द हूँ...आपका शुक्रिया उन्हें पढ़ने का मौका दिया...

    नीरज

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