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आ के वो मुझ खस्ता-जा पर यु करम फरमा गया
कोई दम बैठा, दिले नाशाद को बहला गया

कौन ला सकता है ताब उसके रूखे-पुरनूर कि
जिस तरफ से हो के गुजरा, बर्क सी लहरा गया

आख भर देखना कुछ खता ऐसी न थी
क्या खबर क्यों उनको मुझ पर इतना गुस्सा आ गया

फिर गई एक और ही दुनिया नजर के सामने
बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया

यु तो हम ने भी उसे देखा है लेकिन ए हमीद
जाने तुझ को कौन सा अंदाज उसका भा गया
                                                  - हमीद जालंधरी
मायने 
खस्ता-जा=कमजोर, दिले-नाशाद=दुखी दिल, ताब=ताकत, रूखे-पुरनूर=तेजस्वी मुख, बर्क=बिजली
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  1. देवेन्‍द्र जी, इस शानदार गजल को पढवाकर आपने लाजवाब कर दिया।

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    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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