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अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा
कभी डुबोएगा मुझको कभी बचाएगा

तिलिस्मे-कोहे-निदा जब भी टूट जाएगा
तो कारवाने-सदा भी पलट जाएगा

खिंची रहेगी सरो पर अगर यह तलवारे
माता-ए-जीस्त का अहसास बढ़ता जाएगा

युही डुबोता रहा, कश्तिया अगर सैलाब
तो सतहे-आब पे चलना भी आ ही जाएगा

किवाड़ अपने इसी दर से खोलते ही नहीं
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा
                             - मंज़ूर हाशमी
मायने 
तलातुम=पानी के थपेड़े, लहरे,  तिलिस्म=जादू, कोहे-निदा=आवाज का काफिला, मते-जीस्त=जिन्दगी की पूंजी, सतहे-आब=पानी की सतह
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