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शायद मैं जिंदगी की सहर ले के आ गया
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया

ता उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क की
अंजाम ये के गर्द-ऐ-सफर ले के आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में कांधों पे मैकदा
लो मैं इलाज-ऐ-दर्द-ऐ-जिगर ले के आ गया

'फाकिर' सनम मैकदे में न आता मैं लौटकर
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया- सुदर्शन फाकिर

इसे जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनते है

Roman

shayad mai zindgi ki sahar le ke aa gaya
qatil ko aaj apne hi ghar le ke aa gaya

taumr dhundhta rah manzil me ishq ki
anjam ye ke gard-e-safar le ke aa gaya

nashtar hai mere hath me, kandho pe maikada
lo mai ilaj-e-dard-e-jigar le ke aa gaya

"Fakir" sanam maikde me n aata mai loutkar
ik jakhm bhar gaya tha ishar le ke aa gaya - Sudarshan Fakir

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